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Home»Indain history facts»इसरो (ISRO) का सफर: साइकिल और बैलगाड़ी से मंगलयान और चंद्रयान तक की गौरवगाथा
Indain history facts

इसरो (ISRO) का सफर: साइकिल और बैलगाड़ी से मंगलयान और चंद्रयान तक की गौरवगाथा

Updated:May 31, 2026
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आज जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो (ISRO) अंतरिक्ष की दुनिया में एक के बाद एक नए कीर्तिमान रचता है, तो पूरी दुनिया दांतों तले उंगली दबा लेती है। बहुत ही कम बजट में दुनिया के सबसे सटीक और सफल स्पेस मिशन भेजने वाली यह संस्था आज वैश्विक स्तर पर शीर्ष स्पेस एजेंसियों में शुमार है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि वैश्विक महाशक्तियों को टक्कर देने वाले इस संगठन की शुरुआत एक चर्च के छोटे से कमरे से हुई थी? Indiamitra के इस लेख में हम जानेंगे इसरो के उस शून्य से शिखर तक के सफर की प्रेरक दास्तान, जो हर भारतीय को गर्व से भर देती है।

1. थुम्बा का वो चर्च और साइकिल पर रॉकेट

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत का श्रेय महान दूरदर्शी वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई को जाता है। उन्होंने एक ऐसे समय में अंतरिक्ष कार्यक्रम का सपना देखा जब भारत बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा था। 1962 में ‘इनकोस्पार’ (INCOSPAR) का गठन हुआ, जिसे बाद में 15 अगस्त 1969 को ‘इसरो’ (ISRO) का नाम दिया गया।
भारत का पहला रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन केरल के थुम्बा नामक एक छोटे से मछुआरों के गाँव में बनाया गया था। वहाँ की ‘सेंट मैरी मैरीडलीन चर्च’ को इसरो की पहली प्रयोगशाला और दफ्तर बनाया गया। तत्कालीन वैज्ञानिकों के पास आधुनिक गाड़ियां नहीं थीं; वे रॉकेट के हिस्सों को साइकिल के करियर पर लादकर और रॉकेट के मुख्य हिस्से (शंकु) को एक बैलगाड़ी में रखकर लॉन्चिंग पैड तक ले गए थे। 21 नवंबर 1963 को जब भारत का पहला ‘नाइक-अपाचे’ रॉकेट अंतरिक्ष की ओर उड़ा, तो वह महज़ एक रॉकेट नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत के सपनों की पहली उड़ान थी।

2. ‘आर्यभट्ट’ से ‘क्रायोजेनिक इंजन’ का संघर्ष

19 अप्रैल 1975 को भारत ने सोवियत संघ की मदद से अपना पहला स्वदेशी उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ अंतरिक्ष में भेजा। इसके बाद इसरो ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। हालाँकि, रास्ता इतना आसान नहीं था। भारत को अपनी मिसाइलों और भारी उपग्रहों के लिए ‘क्रायोजेनिक इंजन’ तकनीक की सख्त ज़रूरत थी। जब अमेरिका ने दबाव बनाकर रूस को यह तकनीक भारत को देने से रोक दिया, तो इसरो के वैज्ञानिकों ने इस चुनौती को स्वीकार किया। सालों की कड़ी मेहनत के बाद भारत ने अपना खुद का पूरी तरह स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन विकसित कर दुनिया का घमंड तोड़ दिया।

3. ‘कम बजट, बड़ी सफलता’ और मंगलयान का करिश्मा

इसरो की सबसे बड़ी खासियत इसकी कम लागत और अद्भुत सटीकता है। साल 2013 में इसरो ने अपने पहले ही प्रयास में मंगलयान (Mars Orbiter Mission – MOM) को मंगल की कक्षा में स्थापित कर इतिहास रच दिया। भारत ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश बना। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इस पूरे मिशन का खर्च (लगभग 450 करोड़ रुपये) हॉलीवुड की फिल्म ‘ग्रेविटी’ के बजट से भी कम था। इसके बाद 2017 में इसरो ने एक ही रॉकेट (PSLV-C37) से रिकॉर्ड 104 उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजकर दुनिया को अपनी ताकत का लोहा मनवाया।

4. चंद्रयान, गगनयान और भविष्य की राह

हाल के वर्षों में, चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर चंद्रयान-3 की सफल सॉफ्ट लैंडिंग कराकर भारत ने वह कर दिखाया जो आज तक अमेरिका, रूस या चीन भी नहीं कर पाए थे। आज इसरो सिर्फ उपग्रह भेजने तक सीमित नहीं है। भारत का पहला मानव अंतरिक्ष मिशन ‘गगनयान’ और सूर्य का अध्ययन करने वाला ‘आदित्य-L1’ हमारे अंतरिक्ष विज्ञान के स्वर्णिम युग की गवाही दे रहे हैं। साइकिल और बैलगाड़ी से शुरू हुआ यह सफर आज ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने की कगार पर खड़ा है।

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