एक बार की बात है। तेनालीराम के घर के पास कुछ चोरों को पता चला कि तेनालीराम के पास बहुत धन है। उन्होंने रात में चोरी करने की योजना बनाई।
तेनालीराम को किसी तरह इस बात की खबर मिल गई। उन्होंने चोरों को सबक सिखाने का निश्चय किया।
शाम को तेनालीराम अपनी पत्नी से ऊँची आवाज़ में बोले,
“सुनो! घर में जो सोने-चाँदी के गहने हैं, उन्हें इस बड़े संदूक में रख दो। रात में चोर आ सकते हैं, इसलिए हम इसे कुएँ में डाल देंगे।”
चोर पास की झाड़ियों में छिपे हुए थे। उन्होंने सारी बात सुन ली।
तेनालीराम ने एक खाली संदूक में पत्थर और ईंटें भर दीं और उसे कुएँ में फेंक दिया। फिर वे सोने का नाटक करके सो गए।
आधी रात को चोर आए। उन्हें लगा कि कुएँ में खजाना छिपा है। वे बाल्टियों से पानी निकालने लगे ताकि संदूक तक पहुँच सकें।
घंटों मेहनत करने के बाद भी कुआँ खाली नहीं हुआ। उधर तेनालीराम चुपचाप अपने बगीचे की ओर नाली बना चुके थे। कुएँ से निकला सारा पानी उनके सूखे बगीचे में जा रहा था।
सुबह होने तक चोर थककर चूर हो गए। तभी तेनालीराम बाहर आए और हँसते हुए बोले,
“मित्रों! मेरे बगीचे की सिंचाई करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।”
चोर समझ गए कि वे धोखा खा गए हैं। शर्मिंदा होकर वे वहाँ से भाग गए।
शिक्षा :
👉 बुद्धि और सूझ-बूझ से बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान किया जा सकता है।
👉 बिना मेहनत के धन पाने की लालच हमेशा नुकसान पहुँचाती है।

