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Home»क्रांतिकारियों का जीवन परिचय»आइए जानते हैं , आखिर कौन थी? बेगम हजरत महल .…..
क्रांतिकारियों का जीवन परिचय

आइए जानते हैं , आखिर कौन थी? बेगम हजरत महल .…..

Updated:January 5, 2023
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आप सभी ने तो इतिहास में , इतिहास की किताबों , में कई बार सुना होगा बेगम हजरत महल के बारे में ,आपको बता दें कि 18 57 क्रांति में बेगम हजरत महल का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है । 18 57 की क्रांति में केवल पुरुषों ने ही नहीं महिलाओं ने भी अपने बहुत ही बड़ा योगदान दिया है उन्ही में से थी एक बेगम हजरत महल । बेगम हजरत महल अवध के शासक वाजिद अली शाह की पहली बेगम हजरत महल थी जो कि1857 की क्रांति में कूदने वाली पहली महिला थी ।

बेगम हजरत महल का प्रारंभिक जीवन..

बेगम हजरत महल का जन्म 1820 ई. को अवध के फैजाबाद जिले में बहुत ही छोटे गांव में हुआ , वह बहुत ही गरीब परिवार में जन्मी थी । उन्हें बचपन में सभी लोग मोहम्मदी खातून के नाम से पुकारते थे । बेगम हजरत महल के घरवालों के हालात इतने खराब थे कि उनके माता-पिता उनका पेट भी नहीं पाल सकते थे । जिसके कारण राजशाही घरों में नाचने पर मजबूर होने पड़ा, पुणे शाही हरम के परी समूह में शामिल कर लिया गया जिसके बाद वे “महक परी” के नाम से जानी जाने लगी ।

ऐसे ही उन्हें एक बार जब अवध के नवाब ने देखा तो वे उनकी सुंदरता पर मुक्त हो गया और उन्हें अपनी शाही हरम में शामिल कर लिया और उसके बाद उन्हें अपनी बेगम बना लिया । इसके बाद इन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम इन्होंने बिरजिस कादर रखा । उसके बाद उनको “हजरत महल” की उपाधि दे दी गई।

बेगम हजरत महल

बेगम हजरत महल ने संभाली गद्दी …

काफी संघर्ष भरा जीवन जीने के बाद आखिरकार उनके जीवन में खुशहाली आई , पर इनकी या खुशी ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाई , साल 1856 ई. में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध राज्य पर कब्जा कर लिया और अवध नवाब वाजिद अली शाह को बंदी बना लिया , जिसके बाद बेगम हजरत महल अपने नाबालिग बेटे को राजगद्दी पर बिठाकर अवध की सत्ता संभालने को कहा 7 जुलाई, 1857 ई. से बेगम हजरत महल अंग्रेजों के खिलाफ रणभूमि में उतर गई। उनके अंदर सैन्य एवं युद्ध कौशल और कई विद्यामान गुण थे । उन्होंने अंग्रेजों से अपने राज्य को छुड़ाने के लिए उनसे निडर होकर और बहादुरी से उनका सामना किया ।

अपने राज्य को कराया अंग्रेजों से मुक्त …

अट्ठारह सौ सत्तावन में जब विद्रोह शुरू हुआ तो बेगम हजरत महल अपनी समेत सेना के साथ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह छेड़ दिया। लखनऊ में हुए इस विद्रोह में बेगम हजरत महल ने अवध प्रांत के गोंडा, फैजाबाद, सुल्तानपुर, सीतापुर, बहराइच और भी कई क्षेत्रों को अंग्रेजों से मुक्त करा के लखनऊ पर फिर से अपना कब्जा जमा लिया था। इस लड़ाई मे बेगम हजरत महल ने हाथी पर सवार होकर अपनी सेना का कुशल नेतृत्व किया था । इस भयानक युद्ध के कारण अंग्रेजों को लखनऊ रेजीडेंसी में छिपने के लिए मजबूर होना पड़ा था। हालांकि बाद में अंग्रेजों ने ज्यादा सेना और हथियारों के चलते एक बार फिर से लखनऊ और अवध के ज्यादातर हिस्सों में अपना अधिकार जमा लिया था । जिसके चलते बेगम हजरत महल को पीछे हटना पड़ा और अपना महल छोड़कर उनको वह से जाना पड़ा।

क्या हुआ महल छोड़ने के बाद …

उन्हें नेपाल जाना पड़ा, जब अपना महल छोड़कर नेपाल गई तो उनके पास रहने के लिए कोई भी जगह नहीं थी इसीलिए वे राणा के प्रधान मंत्री जंग बहादुर से रुकने  के लिए स्थान मांगा तो उन्होंने इसके लिए इंकार कर दिया , परंतु बाद में उन्हें रहने की इजाज़त दे दी गई थी।  सन् 1879 उनकी मृत्यु हो गई , और उन्हें काठमांडू के जामा मस्जिद के एक क़ब्र में दफ़ना दिया गया था।

नेपाल के काठमांडू का कब्र जहां बेगम हजरत महल को दफनाया गया था

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