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Home»रोचक»जानिए कब और कैसे किया महात्मा गांधी ने अपने वेश विन्यास में परिवर्तन ? क्यों जानना है जरूरी
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जानिए कब और कैसे किया महात्मा गांधी ने अपने वेश विन्यास में परिवर्तन ? क्यों जानना है जरूरी

Updated:February 16, 2022
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी

जैसा कि आप सभी जानते हैं की महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कह कर संबोधित किया जाता है। महात्मा गांधी देश के एक ऐसे राष्ट्र नायक रहे हैं जिन्होंने राष्ट्र का निर्माण एक अद्भुत तरीके से किया उन्होंने आपसी भेदभाव को मिटाकर के लोगों के बीच सामंजस्य स्थापित किया एवं प्रेम और स्नेह की अलौकिक ज्योती से उनके बीच में एक चेतना जागृत की ।

महात्मा गांधी जब बैरिस्टर की पढ़ाई करने के लिए अफ्रीका गए थे तब वे कोट -पेंट पहनते थे क्योंकि बैरिस्टर की ड्रेस केवल कोट पेंट ही थी पर परंतु पढ़ाई पूरी होने के बाद जब वे भारत लौटे तो उन्होंने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करते हुए स्वदेशी वस्तुएं स्वीकार की।

महात्मा गांधी 9 जनवरी 1915 को बैरिस्टर की पढ़ाई पूरी करने के उपरांत भारत लौटे । हम आपको बता दें कि इसी 9 जनवरी को प्रवासी भारतीय दिवस के रूप में मनाया जाता है

बैरिस्टर की वेशभूषा में महात्मा गांधी

1915 में जब महात्मा गांधी जी जब बैरिस्टर की पढ़ाई करके भारत लौटे तो उसके बाद ही यहां की समस्याएं देखकर भी बड़े द्रवित हुए और उन्हें निश्चय कर लिया कि वह अब मात्र एक लंगोटी में ही पूरा जीवन यापन करेंगे उसके पश्चात उन्होंने मुंडन करवाने का निर्णय किया और बिना सिले हुए वस्त्र पहनने का अटूट दृढ़ निश्चय कर लिया।

साल 1921 में सितंबर की 22 तारीख थी जब महात्मा गांधी जी ने तय किया कि वह अब एक ही वस्त्र पहनेंगे उसी दिन से उन्होंने एक धोती को वस्त्र के रूप में पहनना शुरू के दिया तथा  मदुरै में उन्होंने एक नाई से अपना मुंडन भी करवाया। हम आपको बता देना चाहते हैं कि हमारे यहां अंतिम संस्कार की हिंदू रीति में मुंडन होने के बाद कमर से ऊपर कोई भी वस्तु नहीं पहनने दिया जाता है खासतौर  पर जो सिले हुए वस्त्र हो। बिना सिले कपड़े पहनना ही इसका प्रतीक है।

महात्मा गांधी जी ने कहा कि साल खत्म होने वाला है और हमें स्वराज अभी भी नहीं मिल सका हम सभी पोशाक में है हम सभी सुख में है और यह बात मुझे अच्छी नहीं लग रही है गांधीजी ने लंगोट पहनने के बारे में जो फैसला किया उसकी जड़ें काफी गहरी थी सालों पहले जब वह लंदन में कानून की पढ़ाई कर रहे थे तो वहां उनकी मुलाकात गुजराती लेखक नारायण हेमचंद्र से हुई हेमचंद्र को भारतीय संस्कृति पर काफी गर्व था और वह ब्रिटिश तौर तरीकों की नकल करने के लिए नौजवान गांधीजी की खिल्ली उड़ाते रहते थे

परंतु महात्मा गांधी जी ने मात्र एक धोती पहनकर लंदन वालों को काफी चढ़ा दिया बाद में जब अमेरिका गए तो उन पर मुकदमा चलाया गया कि वे अवैध तरीके से कपड़े पहनते है। इस आरोप के बाद गांधी जी ने जेल में रहकर ही में “सत्य के मेरे प्रयोग “ पुस्तक लिखी जिसमें उन्होंने हेमचंद्र के बारे में एवं अपनी इस घटना के बारे में भी संक्षिप्त में विवरण दिया। साथ ही उन्होंने उनके बारे में एक चैप्टर लिखा की कि हेमचंद्र पश्चिमी शैली की नकल के विरोधी थे उनकी इस बात का जो असर गांधी जी पर भी पड़ा वे हेमचंद्र की इस सोच का काफी सम्मान करते थे

क्या था महात्मा गांधी जी द्वारा भेजा गया तोहफा जिसे देखकर क्वीन मैरी को लगी शर्मिंदगी

एक बार महात्मा गांधी जी ने महारानी एलिजाबेथ की शादी के मौके पर एक तोहफा भेजा हम आपको बता दें कि महारानी एलिजाबेथ मैडम क्यून मैरी की पोती थी यह वही क्वीन मेरी है जो 1911 में जेम्स प्रथम के साथ भारत आई थी । जब महात्मा गांधी ने इनकी पोती की शादी पर अर्थात महारानी एलिजाबेथ की शादी पर एक तोहफा भेजा जिसे देखकर उन्हें बहुत भद्दा महसूस हुआ महात्मा गांधी के इस तोहफे को देखकर महारानी क्वीन मेरी हैरान रह गई क्योंकि यह यह एक सूती कपड़ा था जिसे उसको महात्मा गांधी जी ने स्वयं काता था और सबसे बड़ी बात यह थी कि उस कपड़े के बीच में लिखा था -“जय हिंद जय हिंद”

परंतु क्वीन मैरी को उतना झटका इसे पढ़ कर के नहीं लगा जितना झटका उनको इस बात से लगा कि जो कपड़ा उन्होंने भिजवाया है उस कपड़े से उनके यहां लगोटी बनवाई जाती है। वे इस बात से भी काफी शर्मिंदगी महसूस कर रही थी उन्हें बहुत ही भद्दा लग रहा था कि महात्मा गांधी ने कैसे उन्हें यह तोहफा भिजवा दिया? जबकि वह वस्त्र तो एक देशी निर्मित वस्तु की पहचान थी जिसको वे भद्दा समझ रही थी।

दोस्तों महात्मा गांधी ने तय कर लिया था कि अब वे विदेशियो की नकल नहीं करेंगे और ना ही सूट-बूट पहन कर कहीं जाएंगे वे अब अपने देश में स्वदेशी निर्मित वस्तुओं को ही धारण करेंगे यह उनका दृढ़ निश्चय था यही कारण है कि महात्मा गांधी जी ने अपना मुंडन करवाने का निर्णय लिया और विदेशी वस्त्रों को त्याग दिया 1921 के बाद से जब तक महात्मा गांधी जी जीवित रहे अर्थात 1948 तक उन्होंने मात्र एक लंगोटी में ही अपना पूरा जीवन व्यतीत कर दिया उनके जैसा एक अद्भुत तेजस्वी और दृढ़ इच्छाशक्ति वाला निश्चयी व्यक्ति शायद ही इस दुनिया में आज तक आपने देखा होगा।

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