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Home»Guddi ke lal»दसरथ मांझी को पहाड़ काटने का जूनून था इन्हें पत्रकारिता का है – गुदड़ी के लाल
Guddi ke lal

दसरथ मांझी को पहाड़ काटने का जूनून था इन्हें पत्रकारिता का है – गुदड़ी के लाल

Updated:March 27, 2021
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एक गरीब पत्रकार की कहानी जिसे लोग सीतापुर का “बीबीसी लन्दन” कहतें है

लखनऊ। बड़े-बड़े नामी-गिरामी मीडिया संस्थानों के अच्छे वेतन पर कार्य करने वालों पत्रकारों से आप अक्सर रूबरू होते रहते हैI किसी न किसी सेट अजेंडे के तहत चलने वाली पत्रकारिता और खूबसूरत चेहरों वाले न्यूज़ एंकरों की एक्टिंग तो आप रोज देखते है। लेकिन आज हम आपको मिलाने जा रहे है उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद के एक ऐसे पत्रकार से जो साधन संसाधनों के अभाव में अपने मनोबल के बूते पत्रकारिता में सक्रीय है। अपने चेहरे से खासी शिकायत रखने वाले इस पत्रकार के चेहरे को आज यूट्यूब के माध्यम से 68.8 हजार लोग देखते है। फेसबुक पेज पर 10 हजार फालोवर है। आज स्थानीय लोगों की समस्याओं के लिए ये एक बड़ा मंच बन गया है। खबरें ऐसी है जिनसे हम आप भले ही अपना कोई सरोकार न समझे लेकिन जनसरोकार जरुर है।
गुदड़ी के लाल - प्रेम बाजपाई पत्रकार रेउसा | Guddi ke laa - Prem Bajpai Patrkar Reusa
गुदड़ी के लाल – प्रेम बाजपेई पत्रकार रेउसा

चाहे कस्बा हो या दूरदराज के गाँव में किसी की बकरी चोरी हो गयी हो, किसी के मासूम बच्चे को सांप ने डस लिया हो, याा किसी गरीब की झोपड़ी में आग लग गयी हो, या फिर घाघरा के बढ़ते पानी ने गरीबों काा आशियाना छीन लिया हो , दरोगा की किसी गरीब से गुंडई करने की खबर हो, या कोटेदार के घटतौली की खबर या फिर जिले के किसी आलाधिकारी द्वारा कोई स्थानीय समस्या का संज्ञान न लिया जा रहा हो। यहाँ हर मर्ज की एक ही दवा है पत्रकार प्रेम बाजपेयी रेउसा वाले …
आज हम मिलाने जा रहे है ऐसे ही एक पत्रकार प्रेम से जिनमे पत्रकारिता करने लोगों की समस्याओं को मंच देने का जूनून हैI भले ही प्रेम प्रोफेशनल पत्रकारों की तरह सही हिंदी नही लिख बोल पाते या यूटयूब उन्हें सही से लिखना नही आता लेकिन बावजूद इसके अपने चैनल पर सरल स्थानीय भाषा में लोगों को मंच देना उन्हें बखूबी आता है।
इंडिया मित्र डाट काम के एक सहयोगी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट देखी “चेहरे की किताब(फेसबुक) के सभी गुर्जनो को प्रणाम मेरा मोबाइल खराब हो गया है इसलिए अब यूटयूब पर खबरे नही आ पाएंगी “ कुछ दिन बाद एक और पोस्ट दिखी पत्रकार प्रेम के प्रोफाइल पर सभी क़स्बा वालों का शुक्रिया जिन्होंने मुझे मोबाइल फोन चंदा लगाकर गिफ्ट किया अब आप यूट्यूब पर खबरे देख पाएंगे।
ये रुचिकर था …इंडियामित्र डाट काम ने प्रेम के बारे में तहकीकात की तो पता चला की प्रेम मूल रूप से जनपद सीतापुर के रेउसा क़स्बा के बसंतापुर गाँव के निवासी है। अखबार बाटने के साथ-साथ एक दैनिक अख़बार में सूचनाये संकलित करके भेजने का काम करते है। लगभग चार साल पहले जब प्रेम ने बमुश्किल एक सस्ता स्मार्ट फोन ख़रीदा तो उन्होंने गूगल के माध्यम से यूट्यूब चैनल के बारे में जानकारी हासिल की और अपने फोन के माध्यम से यूट्यूब चैनल बनाया ताकि रेउसा क़स्बा और आस-पास के गाँव की खबर शासन-सरकार तक पहुचाई जा सकेI आर्थिक रूप से बेहद कमजोर प्रेम के आय का एक मात्र जरिया अख़बार वितरण होने वाली आय है। और उसी आय में प्रेम 6 जनों के परिवार का खर्च चलाते है।

प्रेम ने बातचीत के दौरान बताया कि सुबह चार बजे अख़बार  बांटने निकलते है और लगभग 60 किमी प्रतिदिन साइकिल चलाकर रेउसा और आसपास के गाँव तक अख़बार बांटने काम करते है। और यही उनके परिवार की आजीविका का एकमात्र साधन है। मैट्रिक तक पढ़े प्रेम की पारवारिक पृष्ठभूमि के बारे में पूछने पर प्रेम बताते है कि उनके जन्म के कुछ समय बाद ही माता-पिता की मौत हो गयी और परिवार के चाचा आदि ने प्रेम को मुर्दा घोषित कराकर प्रेम के पिता की जमीन अपने नाम करवा लीI प्रेम ने बताया कि मुझे रास्ते पता है लेकिन क़ानूनी लड़ाई लड़ने के लिए मेरे पास न तब पैसे और न ही अब है। राजस्व मामलों के मुकदमे लड़ना गरीब इंसान के बस की बात आज भी नहीं है।

वो आगे बताते है, “लगभग 20 साल से अख़बार का काम करके घर तो नही लेकिन रेउसा में सिर छिपाने भर की जगह का इंतजाम हो गया है। रोजी रोटी चल रही है और पत्रकार होने के कर्तव्य का निर्वहन कर पा रहा हूँ ये संतोष मुझे और अच्छा करने की प्रेरणा देता है।”

यूट्यूब से मिले पैसे से लगवाया घर में दरवाजा…

ये पूछने पर की क्या यूट्यूब चैनल से कोई आर्थिक मदद मिली है इस पर प्रेम ने बताया, एक बार कुछ पैसा आया था। मेरे घर के आसपास सबके अच्छे और सुंदर मकान बने है लेकिन मेरे घर में दरवाजा-पल्ला भी नहीं है। तो जब यूट्यूब से पैसा मिला तो उस पैसे से मैंने अपने घर में दो जोड़ी दरवाजा लगवा लिया।”

अब खबर का असर हो जाता है …

प्रेम बताते है की शुरू शुरू में मेरे अस्त व्यस्त कपड़ों और वेशभूषा के कारण अधिकारी कर्मचारी तवज्जो नही देते थे लेकिन अब चेहरे की किताब और यूट्यूब की कृपा से मेरी द्वारा उठाये गये मुद्दों और लोगों की समस्याओं पर अधिकारीगण संज्ञान लेते है और पत्रकार होने के नाते यही मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

होली…दीवाली गुमनाम लोग करते है मदद …

प्रेम ने बताया की मेरे पास जो मोबाइल फोन है वो स्थानीय दयालु लोगों ने चन्दा लगाकर मुझे दिया था और इसी के सहारे मै अपना यूट्यूब चैनल चला रहा हूँ। मेरे पास इतने पैसे नही है कि मैं 35 हजार का लैपटॉप खरीद सकूँ। लेकिन जितना हो सकता है वो करता रहता हूँ।

खर्चा कैसे चलता है इस पर प्रेम बताते है, मेरा क्षेत्र और यहाँ के लोग बहुत अच्छे हैI बहुत बार मेरी दिक्कतों को देखकर अनजान लोग किसी न किसी माध्यम से मुझे मदद कर देते है और मै “चेहरे की किताब (फेसबुक)” पर उनका धन्यवाद कह देता हूँ। होली-दिवाली जैसे त्योहारों पर कोई गुमनाम फरिश्ता मुझे दो जोड़ी नए कपडे, शाल, मिठाई और एक हजार रूपये किसी न किसी के माध्यम से भेज देते है इससे मेरे परिवार का त्यौहार हंसी-ख़ुशी निपट जाता है। मै आपके माध्यम से भी उन सभी दयालु लोगों को धन्यवाद कहना चाहता हूँ जो गाहे-बगाहे बिना बताये मदद करते है।


सीरीज “गुदड़ी के लाल“ के तहत हम ऐसे लोगों से आपकी मुलाक़ात कराते रहेंगे जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने जिद और जूनून के बल पर आगे बढ़ रहे है। अगर आप भी किसी ऐसे गुदड़ी के लाल के बारें में जानते है तो हमें उनकी कहानी इमेल करें।  
Email – Editor.indiamitra@gmail.com
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