19वीं सदी के अंत में जब भारत ब्रिटिश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब दुनिया हमें सपेरों और पिछड़ों का देश समझती थी। ऐसे समय में एक युवा संन्यासी ने सात समंदर पार जाकर वैश्विक मंच पर भारत की ज्ञान-परंपरा और सनातन धर्म का ऐसा शंखनाद किया कि पूरी दुनिया दंग रह गई। वह ऐतिहासिक पल था 11 सितंबर 1893 का ‘शिकागो विश्व धर्म संसद’। Indiamitra के इस लेख में हम जानेंगे स्वामी विवेकानंद के उस ऐतिहासिक भाषण की कहानी, जिसने वैश्विक मंच पर भारत का मस्तक हमेशा के लिए ऊंचा कर दिया।
1. शिकागो की यात्रा और शुरुआती संघर्ष
अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के महासमाधि लेने के बाद स्वामी विवेकानंद ने पूरे भारत का भ्रमण किया था। उन्होंने देश की गरीबी को भी देखा और हमारी सांस्कृतिक समृद्धि को भी। जब उन्हें अमेरिका के शिकागो में होने वाली ‘विश्व धर्म संसद’ (World’s Parliament of Religions) के बारे में पता चला, तो उन्होंने भारत के विचारों को वहाँ रखने का फैसला किया। हालाँकि, वहाँ पहुँचना और मंच तक जगह बनाना आसान नहीं था। उनके पास न तो किसी आधिकारिक संस्था का आमंत्रण पत्र था और न ही कड़ाके की ठंड से बचने के सही साधन। लेकिन हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जे.एच. राइट की मदद से उन्हें अंततः बोलने का अवसर मिला।
2. “अमरीका के भाइयों और बहनों!”
11 सितंबर 1893 को शिकागो के आर्ट इंस्टीट्यूट में जब स्वामी विवेकानंद मंच पर आए, तो उनके चेहरे पर एक दिव्य तेज था। जैसे ही उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत अंग्रेजी में की—”Sisters and brothers of America!” (अमरीका के भाइयों और बहनों!), तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। 7 हजार से ज्यादा लोगों की भीड़ ने खड़े होकर (Standing Ovation) पूरे दो मिनट तक तालियां बजाईं। उस दौर में जहाँ अन्य धर्मगुरु अपने भाषण की शुरुआत ‘लेडीज एंड जेंटलमैन’ जैसी औपचारिकताओं से कर रहे थे, वहीं विवेकानंद के इन पांच शब्दों ने वसुधैव कुटुंबकम् (पूरी दुनिया एक परिवार है) के भारतीय विचार से सबका दिल जीत लिया।
3. भाषण का मूल संदेश: सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकार्यता
विवेकानंद ने अपने संक्षिप्त भाषण में स्पष्ट किया कि वे एक ऐसे धर्म से आते हैं जिसने दुनिया को ‘सहिष्णुता’ (Tolerance) और ‘सार्वभौमिक स्वीकार्यता’ (Universal Acceptance) दोनों सिखाया है। उन्होंने गर्व से कहा कि भारत ने हमेशा दुनिया के प्रताड़ित और शरणार्थी समुदायों (जैसे पारसी और यहूदी) को अपने यहाँ शरण दी है। उन्होंने अलग-अलग धर्मों को विभिन्न नदियों के समान बताया जो अंत में एक ही समुद्र (ईश्वर) में जाकर मिलती हैं। उन्होंने धार्मिक कट्टरता और सांप्रदायिकता की कड़े शब्दों में निंदा की।
4. वैश्विक प्रभाव और विरासत
इस एक भाषण ने रातों-रात स्वामी विवेकानंद को अमेरिका का सबसे लोकप्रिय व्यक्तित्व बना दिया। वहाँ के प्रमुख अखबार ‘न्यूयार्क हेराल्ड’ ने लिखा था, “विवेकानंद को सुनने के बाद हमें महसूस होता है कि भारत जैसे बुद्धिमान राष्ट्र में ईसाई मिशनरियों को भेजना कितनी बड़ी मूर्खता है।” इस भाषण ने पश्चिमी दुनिया का भारत के प्रति दृष्टिकोण पूरी तरह बदल दिया और साबित किया कि अध्यात्म के मामले में भारत दुनिया का जगद्गुरु है।

