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Home»Indain history facts»शिवाजी महाराज की नौसेना: भारतीय नौसेना के जनक और उनकी अचूक युद्ध नीति
Indain history facts

शिवाजी महाराज की नौसेना: भारतीय नौसेना के जनक और उनकी अचूक युद्ध नीति

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जब हम भारत के गौरवशाली इतिहास और महान राजाओं की बात करते हैं, तो छत्रपति शिवाजी महाराज का नाम सबसे अग्रिम पंक्ति में आता है। शिवाजी महाराज न केवल एक कुशल रणनीतिकार और वीर योद्धा थे, बल्कि वे एक दूरदर्शी शासक भी थे। 17वीं शताब्दी में, जब भारत के अधिकांश राजा सिर्फ ज़मीनी सीमाओं को सुरक्षित करने में लगे थे, तब शिवाजी महाराज ने समंदर की ताकत को पहचाना। उन्होंने समझा कि विदेशी आक्रमणकारियों को रोकने के लिए भारत की समुद्री सीमाओं का सुरक्षित होना कितना ज़रूरी है। यही कारण है कि उन्हें ‘भारतीय नौसेना का जनक’ (Father of Indian Navy) कहा जाता है। Indiamitra के इस विशेष लेख में हम जानेंगे उनकी नौसेना के गठन और उसकी अचूक युद्ध नीति की पूरी कहानी।

1. नौसेना की स्थापना: “जिसका समंदर, उसका राज”

छत्रपति शिवाजी महाराज का एक प्रसिद्ध कथन था—”ज्यांचा जलतलाव, त्याचा समुद्र” यानी जिसका जल पर नियंत्रण है, वही समुद्र का स्वामी है। 1650 के दशक में उन्होंने देखा कि जंजीरा के सिद्दी, पुर्तगाली, डच और अंग्रेज समुद्री रास्तों से भारत में घुसपैठ कर रहे थे और तटीय इलाकों को लूट रहे थे।
इस विदेशी खतरे से निपटने के लिए शिवाजी महाराज ने 1657-1559 के आसपास कल्याण और भिवंडी में अपने जहाजों का निर्माण शुरू करवाया। उन्होंने कोंकण तट की सुरक्षा के लिए एक मजबूत मराठा नौसेना (Maratha Navy) की नींव रखी, जिसमें लड़ाकू जहाजों (जैसे गुराब, गैलीवत, मचवा और पाल) का बेड़ा शामिल था।

2. समुद्री किले: पानी में अभेद्य दीवारें

शिवाजी महाराज की नौसेना की सबसे बड़ी ताकत उनके द्वारा बनवाए गए समुद्री किले (Sea Forts) थे। उन्होंने तटीय रक्षा को मजबूत करने के लिए रणनीतिक स्थानों पर किलों का निर्माण और जीर्णोद्धार कराया।
सिंधुदुर्ग किला: मालवन के तट पर चट्टानों के बीच बना यह किला मराठा नौसेना का मुख्य केंद्र था। इसे इस तरह डिज़ाइन किया गया था कि दुश्मन के जहाज इसके करीब न आ सकें।
विजयदुर्ग और पद्मदुर्ग: इन किलों की मदद से मराठा नौसेना समुद्र से आने वाले हर दुश्मन पर नज़र रखती थी और तटीय व्यापार की सुरक्षा करती थी।

3. ‘गनिमी कावा’ और नौसैनिक युद्ध नीति

जमीनी युद्ध की तरह ही शिवाजी महाराज ने समुद्र में भी छापामार युद्ध नीति यानी ‘गनिमी कावा’ (Guerrilla Warfare) का इस्तेमाल किया। मराठों के जहाज आकार में पुर्तगाली और अंग्रेज जहाजों की तुलना में छोटे और हल्के होते थे।
रणनीतिक बढ़त: छोटे जहाजों के कारण मराठा सैनिक उथले पानी (shallow waters) और खाड़ियों में बहुत तेजी से मुड़ सकते थे, जहाँ भारी विदेशी जहाज फंस जाते थे।
अचानक हमला: मराठा नौसेना दुश्मन के जहाजों पर अचानक हमला करती थी, उनकी रसद (supplies) लूटती थी और इससे पहले कि दुश्मन संभल पाता, वे तटीय किलों की आड़ में गायब हो जाते थे। इस नीति ने सिद्दियों और अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था।

4. आधुनिक भारतीय नौसेना में शिवाजी महाराज की विरासत

शिवाजी महाराज की यह दूरदर्शी सोच आज भी भारत की रक्षा नीति का आधार है। भारतीय नौसेना उनके योगदान को कितना सम्मान देती है, इसका सबसे बड़ा प्रमाण हाल ही में देखने को मिला। भारतीय नौसेना के नए ध्वज (Naval Ensign) से ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रतीक ‘सेंट जॉर्ज क्रॉस’ को हटाकर छत्रपति शिवाजी महाराज की शाही मोहर (राजमुद्रा) से प्रेरित अष्टकोणीय डिज़ाइन को शामिल किया गया है। यह इस बात का प्रतीक है कि आधुनिक भारतीय नौसेना आज भी शिवाजी महाराज के आदर्शों और उनकी समुद्री विरासत पर गर्व करती है।

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