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Home»Environment»गंगा को कर रहा तबाह ग्लोबल वार्मिंग: जाने कैसे?
Environment

गंगा को कर रहा तबाह ग्लोबल वार्मिंग: जाने कैसे?

Updated:June 3, 2022
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वर्तमान समय में यदि तापमान के स्तर को देखा जाए तो दोस्तों लगातार बढ़ता जा रहा है इसका सबसे प्रमुख कारण है ग्लोबल वार्मिंग , जो ना केवल जीव जंतु के लिए वरन वनस्पतियों , जल जीवो, नदियों तालाबों एवं स्मारकों के साथ-साथ प्रत्येक व्यक्ति के लिए भी अत्यंत हानिकारक है

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि केदारनाथ धाम में कपाट खुलने के साथ ही पहले दिन 20000 भक्तों की भीड़ वहां उम्र उमड़ आई। हिमालय क्षेत्र को लेकर ऐसे ही कई शोध सामने आ रहे हैं जिनसे पहाड़ों में लगातार तापमान बढ़ने की गति को लेकर वैश्विक गति के बराबर तापमान आंका जा रहा है। जिससे लगातार ग्लेशियर भी पिघल रहे हैं। कई शोधों के द्वारा यह भी पता चला है इसका सबसे बड़ा गंभीर कारण ग्लोबल वार्मिंग है। पहाड़ों और शीतल जल वायु और शांत प्रकृति के बीच लोग ग्लोबल वार्मिंग के खतरों से उदासीन हैं

परंतु पहाड़ों पर रहने वाले लोग इन खतरों के प्रति और उनसे होने वाली चुनौतियों से निपटने को लेकर बाहरी लोगों की अपेक्षा कहीं ज्यादा संजीदा है।

हाल ही में आई जलवायु परिवर्तन की रिपोर्ट पर संयुक्त राष्ट्र के अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की रिपोर्ट के मुताबिक कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पीसी तिवारी के शोध पत्रों के मुताबिक बताया गया है कि हमारे क्षेत्र का तापमान लगातार बढ़ रहा है।2000 से 2010 के बीच 0.2 डिग्री सेल्सियस और 2011 से 2020 तक 0.3 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ा। जबकि वर्तमान में तापमान 41 डिग्री के पार पहुंच गया।

जाने गंगा के अलावा कौन-कौन सी नदियां प्रभावित हो रही है ग्लोबल वार्मिंग से

तापमान और उससे बढ़ने वाली ग्लोबल वार्मिंग के कारण गंगा लगातार प्रदूषित हो रही है और इसके अलावा गंगा की प्रमुख सहायक नदी अलकनंदा के सेटेलाइट चित्रों के आधार पर कहा गया है कि अलकनंदा बेसिन ग्लोबल वार्मिंग की गहरी चपेट में है।

अलकनंदा बद्रीनाथ से आगे उच्च हिमालय के अलकापुरी क्षेत्र में संतोपथ और भागीरथी ग्लेशियर से निकलती है । इस नदी के बारे में अंतरराष्ट्रीय जनरल जिओ कार्टो में प्रकाशित अध्ययन से पता चला है कि पिछले 50 वर्षों में अलकनंदा के ग्लेशियरों का क्षेत्रफल 59 वर्ग किलोमीटर यानी 8% तक सिकुड़ गया है।

मुख्य ग्लेशियर छोटे-छोटे हिस्सों में बढ़ चुका है लघु ग्लेशियर गलन की गति में भी इजाफा कर रहे हैं।मगर नदी जल के रूप में योगदान करने में सक्षम नहीं है। अलकनंदा की इस हालत के कारण आने वाले समय में गंगा नदी को पानी की भारी कमी का सामना करना पड़ सकता है नए मौसम या दिनों के मुताबिक पहाड़ों की जलवायु में हो रही तब्दीलियां वैश्विक रुझान से भी अलग नहीं है। उदाहरण के तौर पर अगर हम आपसे बात करें तो अलकनंदा बेसिन में ठंडक का तापमान 1968 से 2020 तक प्रतिवर्ष 0.03 डिग्री सेल्सियस बढ़ रहा है।

बद्रीनाथ की खूबसूरत उपत्तिका का तो मई के दूसरे पखवाड़े तक नाना प्रकार के आकार वाले बर्फ की सिल्लियां फैली रहती थी लेकिन तापमान बढ़ने के कारण इस बार मंदिर के कपाट खुलते वक्त बद्रीनाथ पहुंचने वाले श्रद्धालु ऐसे दृश्य से वंचित रह गए।

ग्लोबल वार्मिंग के सिद्धांत कारों के अनुसार हिमालय के अधिकांश जिले से लगातार ग्लेशियर पिघलते जा रहे हैं। यह प्रक्रिया जैसे -जैसे तेज हो रही है हिमालय में हिमस्खलन में भी तेजी आ रही है ।ऊपर टूटते बर्फ की सिल्लिया नीचे घाटी में बहने वाली नदियों का जलस्तर बढ़ा देती हैं । इससे शुरू में बाढ़ का कहर टूटेगा और बाद में पानी की कमी से अनेक नदियां पीली पड़ जाएंगी।

भारत सरकार ने 2008 में जलवायु परिवर्तन नेशनल मिशन फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट ऑफ़ हिमालय नामक कार्यक्रम जारी किया था इसी कड़ी में जून 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार ने नेशनल मिशन फॉर हिमालयन स्टडीज के लिए 108 करोड रुपए की मंजूरी भी दी थी लेकिन इन मिशनों के माध्यम से कितना कार्य हो पाया यह बता पाना काफी मुश्किल है। इस कारण यह है कि आज भी हमारे पास हिमालय को लेकर आज भी लंबी अवधि के आंकड़े नहीं है। इसलिए हम जलवायु परिवर्तन जैसे खतरों से बचने के लिए लंबी अवधि की योजनाएं नहीं बना पा रहे हैं।

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