मोहिनी एकादशी की कथा अत्यंत प्रेरणादायक और पापों से मुक्ति देने वाली मानी जाती है।
प्राचीन समय में सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम का एक सुंदर नगर था। वहाँ द्युतिमान नामक एक धर्मात्मा राजा राज्य करता था। उसी नगर में धनपाल नाम का एक धनी व्यापारी रहता था, जो बहुत दयालु और धार्मिक स्वभाव का था। उसके पाँच पुत्र थे, जिनमें सबसे छोटा पुत्र दुराचारी और बुरी संगति में पड़ गया था। उसका नाम था दुष्टबुद्धि।
दुष्टबुद्धि जुआ, शराब और गलत कार्यों में लिप्त रहने लगा। उसने अपने पिता की सारी संपत्ति बर्बाद कर दी। अंततः उसके पिता ने उसे घर से निकाल दिया। घर से निकाले जाने के बाद वह जंगलों में भटकने लगा और अत्यंत कष्टपूर्ण जीवन जीने लगा।
एक दिन वह भूखा-प्यासा भटकते हुए एक आश्रम में पहुँचा, जहाँ उसे महर्षि कौंडिन्य मिले। ऋषि ने उसकी दयनीय अवस्था देखकर उस पर दया की। दुष्टबुद्धि ने उनसे अपने दुखों का कारण बताया और उनसे मुक्ति का उपाय पूछा।
तब महर्षि कौंडिन्य ने उसे मोहिनी एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि यह व्रत सभी पापों को नष्ट करने वाला है और इससे जीवन में सुख-शांति आती है।
दुष्टबुद्धि ने पूरे श्रद्धा और विश्वास के साथ मोहिनी एकादशी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसके सभी पाप नष्ट हो गए और उसका जीवन बदल गया। वह फिर से एक सदाचारी और धर्मात्मा व्यक्ति बन गया। अंत में उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई।
सीख:
यह कथा हमें सिखाती है कि चाहे व्यक्ति कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो, यदि वह सच्चे मन से भगवान भगवान विष्णु की भक्ति करे और मोहिनी एकादशी का व्रत रखे, तो उसके सभी पाप नष्ट हो सकते हैं और जीवन में नया उजाला आ सकता है।

