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Home»धर्म»माता अम्बे का प्रथम स्वरूप :  मां शैलपुत्री
धर्म

माता अम्बे का प्रथम स्वरूप :  मां शैलपुत्री

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आज मां दुर्गा के पूजन का प्रथम दिन है।उदया तिथि के आधार पर चैत्र नवरात्रि आज यानी 09 अप्रैल से शुरू हो गई है। इस वर्ष चैत्र नवरात्रि के पहले दिन सर्वार्थ सिद्धि और अमृत योग रहेगा। वैदिक ज्योतिष में इन योगों में पूजा बहुत ही शुभ फलदायी होती है। 

नवरात्रि में माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है जो कि इस प्रकार हैं:

उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।

अर्थ – पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चंद्रघंटा, चौथी कूष्मांडा, पांचवी स्कंध माता, छठी कात्यायिनी, सातवीं कालरात्रि, आठवीं महागौरी और नौवीं सिद्धिदात्री। ये मां दुर्गा के नौ रुप हैं। हिमालय का एक नाम शैलेंद्र या शैल भी है।

नवरात्रि की प्रतिदिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इस दिन सबसे पहले कलश स्थापना करके माता का आवाहन किया जाता है उसके पश्चात पूजा अर्चना आदि किया जाता है। शैल का अर्थ है हिमालय और पर्वतराज हिमालय के यहां जन्म लेने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। पार्वती के रूप में इन्हें भगवान् शंकर की पत्नी के रूप में भी जाना जाता है। वृषभ (बैल) इनका वाहन होने के कारण इन्हें वृषभारूढा के नाम से भी जाना जाता है। इनके दाएं हाथ में त्रिशूल है और बाएं हाथ में इन्होंने कमल धारण किया हुआ है।

चैत्र नवरात्रि एक प्रमुख हिंदू उत्सव है। यह नौ दिनों तक चलता है और इस दौरान भक्त देवी दुर्गा के सम्मान में उपवास करते हैं । वे नौ अलग-अलग तरीकों से उससे प्रार्थना करते हैं। 

माता शैलपुत्री देवी कवच

ओमकार:में शिर: पातुमूलाधार निवासिनी।

हींकार,पातुललाटेबीजरूपामहेश्वरी॥

श्रीकार:पातुवदनेलज्जारूपामहेश्वरी।

हूंकार:पातुहृदयेतारिणी शक्ति स्वघृत॥

फट्कार:पातुसर्वागेसर्व सिद्धि फलप्रदा।

मां शैलपुत्री को यह भोग करे अर्पित

मां शैलपुत्री के चरणों में गौघृत अर्पित करने से भक्तों को आरोग्य और दीर्घ आयुका आशीर्वाद मिलता है और उनका मन एवं शरीर दोनों ही निरोगी रहता है।इसके साथ ही गौघृत का अखंड दीपक भी जलाते हैं |

माता शैलपुत्री की कथा


माता शैलपुत्री से जुड़ी एक कहानी का उल्लेख यहां करना आवश्यक है। प्राचीनकाल में जब सती के पिता प्रजापति दक्ष यज्ञ कर रहे थे तो उन्होंने सारे देवताओं को इस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया, लेकिन अपने जामाता भगवान महादेव और अपनी पुत्री सती को आमंत्रित नहीं किया। लेकिन सती की अपने पिता के यज्ञ में जाने की बहुत इच्छा थी। उनकी व्यग्रता देख शंकर जी ने कहा कि संभवत: प्रजापति दक्ष हमसे रुष्ट हैं इसलिए उन्होंने हमें आमंत्रित नहीं किया होगा। शंकरजी के इस वचन से सती संतुष्ट नहीं हुई और जाने के लिए अड़ गई। उनकी जिद देखकर भगवान शंकर ने उन्हें वहां जाने की अनुमति दे दी। सती जब अपने पिता के घर पहुंची तो सिर्फ मां ने ही उन्हें स्नेह दिया। बाकी सदस्यों ने उनसे ठीक से बात नहीं की और व्यंग्यात्मक छींटाकशी भी की। दक्ष ने भी शंकर के प्रति कुछ बातें कहीं जो सती को उचित नहीं लगी। अपने पति का तिरस्कार होता देख उन्होंने योगाग्नि से अपने आप को भस्म कर लिया। जब शंकर को सती के भस्म होने के बारे में पता चला तो वे क्रोधित हो गए और उन्होंने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करवा दिया। यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं। शैलपुत्री का विवाह भी भगवान शंकर से हुआ और वे फिर से उनकी पत्नी बन गईं

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