भूमिका:
भारतीय ज्योतिष में 27 नक्षत्रों का विशेष स्थान है। इन सभी नक्षत्रों में पुष्य नक्षत्र को सबसे शुभ और पवित्र नक्षत्र माना गया है। इसे “नक्षत्रों का राजा” भी कहा जाता है, क्योंकि यह हर प्रकार के शुभ कार्यों के लिए श्रेष्ठ माना गया है।
पुष्य नक्षत्र का अर्थ और प्रतीक
“पुष्य” शब्द संस्कृत के ‘पोषण’ धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है – पालन-पोषण करना, बढ़ाना, समृद्धि देना।
इस नक्षत्र का प्रतीक गाय का थन (उदर) माना गया है, जो पोषण और जीवनदायिनी शक्ति का प्रतीक है।
इस नक्षत्र के देवता बृहस्पति (गुरु) हैं, जो ज्ञान, धर्म और बुद्धि के अधिपति हैं, जबकि इसका स्वामी ग्रह शनि (Saturn) होता है।
यह अनोखा संयोजन ज्ञान, स्थिरता और समृद्धि प्रदान करता है।
पुष्य नक्षत्र की विशेषताएँ
1. यह नक्षत्र जीवन में सफलता, स्थिरता और शुभता लाता है।
2. इस दिन किया गया कार्य दीर्घकाल तक फल देता है।
3. गृह प्रवेश, व्यापार आरंभ, वाहन क्रय, स्वर्ण क्रय, या मंत्र सिद्धि जैसे सभी कार्य शुभ माने जाते हैं।
4. इस दिन कोई भी कार्य मुहूर्त निकालने की आवश्यकता के बिना किया जा सकता है — इसलिए इसे “सर्वसिद्धि योग” भी कहा जाता है।
पुष्य नक्षत्र का धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म के अनुसार, इस नक्षत्र में भगवान शिव, लक्ष्मी, और बृहस्पति की पूजा विशेष फलदायी होती है।
इस दिन गाय को चारा खिलाना, गरीबों को अन्न या वस्त्र दान देना, और गुरु का आशीर्वाद लेना अत्यंत शुभ माना गया है।
बहुत से लोग इस दिन स्वर्ण या नया व्यापार शुरू करते हैं ताकि आने वाले समय में धन और सौभाग्य की वृद्धि हो।
पुष्य नक्षत्र और चंद्रमा का संयोग
जब गुरुवार के दिन पुष्य नक्षत्र पड़ता है तो उसे गुरु पुष्य योग कहा जाता है,
और जब रविवार के दिन पड़ता है तो उसे रवि पुष्य योग कहा जाता है।
दोनों योग अति शुभ होते हैं और इन दिनों किया गया हर कार्य दीर्घकालीन सफलता देता है।
उपसंहार
पुष्य नक्षत्र केवल एक खगोलीय स्थिति नहीं, बल्कि यह समृद्धि, श्रद्धा और शुभता का प्रतीक है।
यह हमें सिखाता है कि जब हम अच्छे कर्म करें, दूसरों का पोषण करें और गुरुजनों का आदर करें,
तो हमारा जीवन भी पुष्पित-पल्लवित हो जाता है।

