प्राचीन काल की बात है। सृष्टि के प्रारंभ में भगवान ब्रह्मा ने जीवों की रचना तो कर दी, परंतु पृथ्वी पर चारों ओर नीरवता थी। न कहीं वाणी थी, न संगीत, न ज्ञान का प्रकाश। यह देखकर भगवान ब्रह्मा चिंतित हुए। तब उन्होंने अपने कमंडल से जल छिड़का और उस जल से माँ सरस्वती प्रकट हुईं।
माँ सरस्वती के हाथों में वीणा, पुस्तक और माला थीं। उन्होंने वीणा के तार छेड़े और जैसे ही मधुर स्वर गूंजा, सृष्टि में वाणी, ज्ञान, संगीत और बुद्धि का संचार हुआ। पशु-पक्षी बोलने लगे, मनुष्य को भाषा और विवेक मिला। सारा संसार ज्ञानमय हो उठा।
जिस दिन माँ सरस्वती प्रकट हुईं, वह दिन माघ शुक्ल पंचमी था। उसी दिन से इस तिथि को बसंत पंचमी के रूप में मनाया जाने लगा। यह दिन ज्ञान, विद्या, कला और संगीत की देवी माँ सरस्वती को समर्पित है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने पृथ्वी को ज्ञान और कला से समृद्ध करने के लिए माँ सरस्वती की पूजा की थी। तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि विद्यार्थी, शिक्षक, कलाकार और साधक इस दिन विशेष रूप से माँ सरस्वती का पूजन करते हैं।
बसंत पंचमी का संबंध ऋतु परिवर्तन से भी है। इस दिन से बसंत ऋतु का आरंभ माना जाता है। चारों ओर पीले फूल खिलते हैं, खेतों में सरसों लहलहाती है। इसलिए इस दिन पीले वस्त्र, पीले पुष्प और पीले व्यंजन अर्पित किए जाते हैं।
💐 शिक्षा, सद्बुद्धि और सृजनशीलता की प्राप्ति के लिए बसंत पंचमी पर माँ सरस्वती की पूजा अत्यंत शुभ मानी जाती है। 💐

