एक गांव में एक परिवार रहता था—मां-बाप, चार बेटे और एक बेटी। पिता ने पूरी जिंदगी मेहनत करके अपने बच्चों को पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया और उन्हें काबिल बनाया। लेकिन समय के साथ बेटों का स्वभाव बदल गया—वे अपने-अपने जीवन में इतने व्यस्त हो गए कि पिता की भावनाओं की कद्र करना भूल गए।
एक दिन अचानक पिता का निधन हो गया। घर में मातम छा गया। जब उनके अंतिम संस्कार की तैयारी होने लगी, तभी एक व्यक्ति वहां आ गया। उसने कहा, “तुम्हारे पिता ने मुझसे 18 लाख रुपये उधार लिए थे। जब तक पैसा नहीं मिलता, मैं इनकी बॉडी नहीं जाने दूंगा।”
यह सुनकर चारों बेटे पीछे हट गए। किसी ने जिम्मेदारी लेने से मना कर दिया। वे एक-दूसरे की ओर देखने लगे, लेकिन कोई आगे नहीं आया। उस वक्त ऐसा लगा जैसे पिता ने जिन बेटों के लिए सब कुछ किया, वही सबसे पीछे खड़े हैं।
तभी उनकी बेटी आगे आई।
उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन आवाज में हिम्मत—
“मैं अपने पिताजी का अंतिम संस्कार करूंगी। पैसे का इंतजाम मैं करूंगी।”
उसने अपने गहने बेचे, कुछ उधार लिया और बड़ी मुश्किल से 18 लाख रुपये जुटा लिए। फिर वह उस व्यक्ति के पास गई और बोली,
“ये लीजिए आपके पैसे… अब मुझे मेरे पिताजी की बॉडी दे दीजिए।”
वह व्यक्ति कुछ देर तक उसे देखता रहा। फिर अचानक उसकी आंखें नम हो गईं। उसने पैसे वापस उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा—
“बेटी, तुम्हारे पिताजी ने मुझसे कोई कर्ज नहीं लिया था… बल्कि मुझे उन्हें 18 लाख रुपये देने थे।
आज मैं ये देखने आया था कि उनके बच्चों में कौन उनके असली संस्कारों का हकदार है।
और आज मुझे जवाब मिल गया… ये पैसे तुम्हारे हैं। तुम ही इनकी असली वारिस हो।”
यह सुनते ही वहां खड़े सभी लोग शर्मिंदा हो गए। चारों बेटे सिर झुका कर खड़े थे, और बेटी अपने पिता के सम्मान के साथ खड़ी थी।
सीख
माता-पिता की असली संपत्ति पैसा नहीं, बल्कि उनके बच्चों के संस्कार होते हैं। और अक्सर बेटियां ही उस प्यार और जिम्मेदारी को सबसे सच्चे दिल से निभाती हैं।
माता-पिता की असली संपत्ति पैसा नहीं, बल्कि उनके बच्चों के संस्कार होते हैं। और अक्सर बेटियां ही उस प्यार और जिम्मेदारी को सबसे सच्चे दिल से निभाती हैं।

