15 अगस्त 1947 को आज़ाद होने के बाद भारत के सामने अपनी संप्रभुता और अखंडता को अक्षुण्ण रखने की बहुत बड़ी चुनौती थी। विशेषकर 1962 में चीन से हुए युद्ध और 1965 व 1971 में पाकिस्तान के साथ संघर्षों ने यह साफ़ कर दिया था कि भारत को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भर होना पड़ेगा। विश्व पटल पर अपनी धाक जमाने और एक महाशक्ति के रूप में उभरने के लिए भारत को एक ऐसे सुरक्षा कवच की आवश्यकता थी, जिसे कोई भी शत्रु भेद न सके। यह कवच था—परमाणु शक्ति। Indiamitra के इस विशेष लेख में हम भारत के उन दो ऐतिहासिक और गुप्त परमाणु अभियानों की गाथा जानेंगे, जिन्होंने वैश्विक राजनीति का रुख हमेशा के लिए बदल दिया।
1. स्माइलिंग बुद्धा (1974): बुद्ध की रहस्यमयी मुस्कान
भारत के परमाणु कार्यक्रम की नींव महान वैज्ञानिक डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने रखी थी। लेकिन इसे अमली जामा पहनाने का साहस तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दिखाया। 18 मई 1974 का वह दिन इतिहास में दर्ज हो गया जब राजस्थान के जैसलमेर जिले में स्थित पोखरण मरुस्थल की धरती अचानक एक महाविस्फोट से काँप उठी।
चूँकि उस दिन ‘बुद्ध पूर्णिमा’ थी, इसलिए इस बेहद गोपनीय मिशन का कोडनेम ‘स्माइलिंग बुद्धा’ (Smiling Buddha) रखा गया था। यह दुनिया का पहला ऐसा परमाणु परीक्षण था जिसे किसी देश ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का स्थायी सदस्य न होते हुए भी सफलतापूर्वक अंजाम दिया था। भारत ने इसे एक ‘शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट’ (Peaceful Nuclear Explosion) करार दिया। इस परीक्षण के सफल होते ही वैज्ञानिकों ने दिल्ली संदेश भेजा—”बुद्ध फिर मुस्कुराए।” इस एक घटना ने पूरी दुनिया, विशेषकर अमेरिका और पश्चिमी देशों को हिलाकर रख दिया।
2. वैश्विक प्रतिबंध और भारत का संघर्ष
पोखरण-1 के सफल परीक्षण के बाद वैश्विक शक्तियों ने भारत को घेरना शुरू कर दिया। अमेरिका ने भारत पर कड़े आर्थिक, तकनीकी और वैज्ञानिक प्रतिबंध (Sanctions) लगा दिए। भारत को परमाणु तकनीक और ईंधन की आपूर्ति रोक दी गई। वैश्विक दबाव इस कदर था कि भारत को परमाणु अप्रसार संधि (NPT) और व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया जाने लगा। लेकिन भारत ने अपनी संप्रभुता से समझौता करने से साफ इनकार कर दिया और यह स्पष्ट किया कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह आत्मरक्षा के लिए है।
3. ऑपरेशन शक्ति (1998): जब वैज्ञानिकों ने अमेरिकी सेटेलाइट्स को दिया गच्चा
1974 के चौबीस साल बाद, भारत को अपने परमाणु कार्यक्रम को पूर्णता प्रदान करनी थी। 1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने बिना किसी वैश्विक दबाव की परवाह किए दोबारा परीक्षण का साहसी फैसला लिया। इस मिशन को नाम दिया गया—’ऑपरेशन शक्ति’ (Operation Shakti)।
इस मिशन के सबसे बड़े मार्गदर्शक और नायक थे हमारे मिसाइल मैन डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम (तत्कालीन डीआरडीओ प्रमुख) और परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष डॉ. आर. चिदंबरम। यह मिशन इतिहास के सबसे कठिन कूटनीतिक और वैज्ञानिक अभियानों में से एक था। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) के जासूसी सेटेलाइट्स चौबीसों घंटे पोखरण की निगरानी कर रहे थे। इनसे बचने के लिए भारतीय वैज्ञानिकों और सैन्य अधिकारियों ने सेना की वर्दी पहनी, छद्म नामों का उपयोग किया और केवल रात के अंधेरे में काम किया।
आखिरकार, 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में एक के बाद एक कुल 5 सफल परमाणु परीक्षण किए गए। 11 मई की शाम को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में गर्व से घोषणा की—”आज भारत एक पूर्ण परमाणु संपन्न राष्ट्र है।”
4. पोखरण का ऐतिहासिक महत्व और विरासत
पोखरण के इन परीक्षणों ने वैश्विक शक्ति संतुलन को हमेशा के लिए बदल दिया। भारत ने दुनिया के सामने अपनी ‘न्यूनतम परमाणु प्रतिरोध’ (Minimum Credible Deterrence) और ‘नो फर्स्ट यूज़’ (No First Use – पहले प्रयोग नहीं) की नीति रखी, जिसने यह साबित किया कि भारत एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति है। इन परीक्षणों ने न केवल देश को अदम्य सुरक्षा कवच प्रदान किया, बल्कि भारतीय विज्ञान और स्वदेशी तकनीक की ताकत का लोहा पूरी दुनिया में मनवाया।

