कॉलेज का पहला हफ़्ता था। क्लास में हर कोई किसी न किसी ग्रुप का हिस्सा बन चुका था। बस दो लोग ऐसे थे जो अब तक अकेले थे—कबीर और अनन्या।
कबीर हमेशा खिड़की के पास वाली सीट पर बैठता था। पढ़ाई में ठीक था, लेकिन लोगों से कम बोलता था। अनन्या नई जगह पर खुद को ढालने की कोशिश कर रही थी। एक दिन पूरी क्लास भर गई तो उसे मजबूरन कबीर के पास बैठना पड़ा।
“अगर मैं यहाँ बैठ जाऊँ तो?” उसने धीरे से पूछा।
कबीर ने किताब से नज़र उठाए बिना कहा, “सीट मेरी नहीं है।”
बस, वहीं से बात शुरू हुई।
कुछ दिनों बाद दोनों साथ लाइब्रेरी जाने लगे। कबीर पढ़ते-पढ़ते अचानक कहता, “चलो, पाँच मिनट बाहर चलते हैं।” और वे कैंपस के पुराने बरगद के नीचे बैठ जाते। अनन्या हर छोटी बात पर हँसती थी, और कबीर उसकी हँसी सुनकर मुस्कुरा देता था। शायद यही प्यार की शुरुआत थी—बिना किसी बड़े इज़हार के।
एक दिन बारिश हो रही थी। दोनों कॉलेज की छत पर खड़े थे। अनन्या ने पूछा, “अगर एक दिन हम अलग हो गए तो?”
कबीर ने जवाब दिया, “कुछ लोग ज़िंदगी से जाते हैं, आदतों से नहीं।” अनन्या चुप हो गई।
कॉलेज खत्म हुआ। नौकरी ने दोनों को अलग-अलग शहरों में भेज दिया। शुरुआत में रोज़ बातें होती थीं, फिर हफ़्ते में एक बार, फिर महीने में… और एक दिन सिर्फ़ “ऑनलाइन” दिख जाना ही हालचाल बन गया।
करीब तीन साल बाद कबीर अपने पुराने कॉलेज गया। सब कुछ बदल चुका था, लेकिन खिड़की वाली वही सीट अब भी वहीं थी।
वह जाकर बैठ गया।
कुछ देर बाद एक लड़की आई और बोली, “माफ़ कीजिए, मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?” कबीर हल्का-सा मुस्कुराया।
“सीट मेरी नहीं है।
उसे महसूस हुआ कि कुछ कहानियाँ खत्म नहीं होतीं। वे बस किसी और की ज़िंदगी में फिर से शुरू हो जाती हैं।
उसने खिड़की से बाहर देखा। बारिश फिर से हो रही थी।
इस बार उसे किसी का इंतज़ार नहीं था, लेकिन यादें अब भी उसके साथ बैठी थीं।

