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Home»Indain history facts»भूमिका: प्रतिरोध का एक नया अध्याय
Indain history facts

भूमिका: प्रतिरोध का एक नया अध्याय

Updated:May 31, 2026
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1920 का वह दौर, जब प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारतीयों को लगा था कि उन्हें कुछ रियायतें मिलेंगी, लेकिन बदले में मिले रौलट एक्ट और जलियांवाला बाग जैसे घाव। इन्हीं जख्मों ने महात्मा गांधी को मजबूर किया कि वे एक ऐसा आंदोलन शुरू करें जो पूरी तरह अहिंसक हो, लेकिन उसकी ताकत परमाणु बम से भी अधिक हो। Indiamitra के इस लेख में हम गहराई से समझेंगे कि ‘असहयोग’ कैसे भारतीयों का सबसे बड़ा हथियार बना।

1. आंदोलन की शुरुआत और गांधी जी का विजन

सितंबर 1920 में कलकत्ता (अब कोलकाता) के विशेष कांग्रेस सत्र में असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव रखा गया। गांधी जी का तर्क सीधा और सटीक था: “अंग्रेज भारत में इसलिए टिके हैं क्योंकि हम उन्हें सहयोग (Cooperation) दे रहे हैं। जिस दिन हमने सहयोग बंद कर दिया, ब्रिटिश साम्राज्य एक साल के भीतर ढह जाएगा।”

2. आंदोलन के मुख्य स्तंभ: बहिष्कार की नीति

यह आंदोलन केवल विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह ब्रिटिश अर्थव्यवथा की जड़ों पर प्रहार था। इसके प्रमुख चरण थे:
विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार: विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। गांधी जी ने ‘खादी’ और ‘चरखे’ को आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनाया।
सरकारी संस्थानों का त्याग: वकीलों ने कचहरी छोड़ी, छात्रों ने सरकारी स्कूल-कॉलेज त्याग दिए। सुभाष चंद्र बोस जैसे लोगों ने सरकारी नौकरियों से इस्तीफा दे दिया।
उपाधियों की वापसी: गांधी जी ने अपनी ‘कैसर-ए-हिंद’ की उपाधि लौटा दी। रविंद्रनाथ टैगोर पहले ही ‘नाइटहुड’ लौटा चुके थे।
शराब की दुकानों पर पिकेटिंग: सामाजिक बुराइयों के खिलाफ भी यह एक बड़ा अभियान बना।

3. ‘स्वराज’ का सपना और जनता की भागीदारी

यह भारत का पहला सही मायने में ‘जन-आंदोलन’ (Mass Movement) था। इसमें शहरों के पढ़े-लिखे वर्ग से लेकर गांवों के किसानों और मजदूरों तक ने हिस्सा लिया।
हिंदू-मुस्लिम एकता: इस आंदोलन ने खिलाफत आंदोलन के साथ हाथ मिलाया, जिससे देश में हिंदू-मुस्लिम एकता का एक ऐसा संगम दिखा जो पहले कभी नहीं देखा गया था।
तिलक स्वराज फंड: बाल गंगाधर तिलक की याद में एक करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा गया, जिसे जनता ने कुछ ही समय में पूरा कर दिया।

4. चौरी-चौरा कांड: एक दुखद मोड़

जब आंदोलन अपने चरम पर था और लग रहा था कि आज़ादी बहुत करीब है, तभी 4 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के चौरी-चौरा में एक हिंसक घटना हुई। एक गुस्साई भीड़ ने पुलिस थाने में आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए।
गांधी जी का फैसला: गांधी जी ने तुरंत आंदोलन वापस ले लिया। उन्होंने कहा, “मैं अहिंसा के रास्ते पर ही आज़ादी चाहता हूँ, चाहे इसके लिए मुझे और इंतज़ार करना पड़े।” इस फैसले ने कई युवा क्रांतिकारियों (जैसे भगत सिंह और बिस्मिल) को निराश किया, जिन्होंने बाद में सशस्त्र क्रांति का रास्ता चुना।

5. आंदोलन का परिणाम और महत्व

भले ही आंदोलन अचानक रुक गया, लेकिन इसने भारत को हमेशा के लिए बदल दिया:
डर का अंत: भारतीयों के मन से ब्रिटिश पुलिस और जेल का डर खत्म हो गया।
कांग्रेस की पहचान: कांग्रेस अब केवल संभ्रांत लोगों की पार्टी नहीं रही, बल्कि आम जनता की आवाज बन गई।
आने वाले आंदोलनों की नींव: इसी अनुभव ने 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का आधार तैयार किया।

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