8 अगस्त 1942—यह वह तारीख है जब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम अपने सबसे चरम और निर्णयात्मक चरण में प्रवेश कर गया। मुम्बई के गोवालिया टैंक मैदान (अब अगस्त क्रांति मैदान) से महात्मा गांधी ने एक ऐसा मंत्र दिया जिसने पूरे देश में आग लगा दी। ‘करो या मरो’ (Do or Die) का यह नारा केवल शब्द नहीं था, बल्कि अंग्रेजों के लिए देश छोड़ने का अंतिम अल्टीमेटम था। Indiamitra के इस विशेष शोधपरक लेख में हम भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि, गांधी जी की रणनीति, आंदोलन के स्वरूप और इसके दूरगामी परिणामों का बारीकी से विश्लेषण करेंगे।
1. आंदोलन की पृष्ठभूमि: क्यों ज़रूरी था यह अंतिम प्रहार?
1942 के आते-आते स्थितियाँ बदल चुकी थीं:
द्वितीय विश्व युद्ध: विश्व युद्ध अपने चरम पर था और अंग्रेज भारतीयों की मर्जी के बिना उन्हें युद्ध में घसीट रहे थे।
क्रिप्स मिशन की विफलता: सर स्टैफोर्ड क्रिप्स के प्रस्ताव को कांग्रेस ने ठुकरा दिया था, क्योंकि उसमें पूर्ण स्वराज की बात नहीं थी। भारतीयों को समझ आ गया था कि अंग्रेज केवल समय बर्बाद कर रहे हैं।
जापान का खतरा: जापान सिंगापुर और बर्मा को जीतते हुए भारत की सीमा तक पहुँच गया था। गांधी जी का मानना था कि अंग्रेजों के भारत में रहने से जापान को हमला करने का मौका मिलेगा, इसलिए उनका जाना ज़रूरी था।
2. ‘करो या मरो’: गांधी जी का बदलता रुख
गांधी जी हमेशा अहिंसा के पुजारी थे, लेकिन 1942 में उन्होंने महसूस किया कि अब और इंतज़ार नहीं किया जा सकता। 8 अगस्त को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) ने ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पास किया।
अंतिम संदेश: गांधी जी ने देश को संबोधित करते हुए कहा, “मैं आपको एक छोटा सा मंत्र देता हूँ, इसे आप अपने दिल में उतार लें। यह मंत्र है—’करो या मरो’। हम या तो भारत को आज़ाद कराएंगे या इस प्रयास में अपनी जान दे देंगे।” इस संदेश ने साबित कर दिया कि गांधी जी अब अंतिम और निर्णयात्मक लड़ाई के मूड में थे।
3. ‘ऑपरेशन जीरो आवर’ और जनता का विद्रोह
अंग्रेजों ने आंदोलन को शुरू होने से पहले ही कुचलने की योजना बना ली थी। 9 अगस्त की सुबह, ‘ऑपरेशन जीरो आवर’ के तहत गांधी जी, नेहरू, पटेल और अन्य सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। अंग्रेजों ने सोचा कि नेतृत्व के बिना आंदोलन खत्म हो जाएगा, लेकिन वे गलत थे।
अभूतपूर्व विद्रोह: जैसे ही नेताओं की गिरफ्तारी की खबर फैली, पूरा देश सड़क पर आ गया। मुम्बई, दिल्ली, कोलकाता, पटना और अहमदाबाद में हड़तालें हुईं।
नेतृत्वहीन आंदोलन: नेताओं की अनुपस्थिति में जनता ने खुद कमान संभाल ली। सरकारी दफ्तरों पर हमला किया गया, रेल पटरियाँ उखाड़ दी गईं, टेलीफोन की लाइनें काट दी गईं। कई जगहों पर (जैसे बलिया, सतारा और मेदिनीपुर) लोगों ने ‘समानांतर सरकारें’ (Parallel Governments) तक स्थापित कर लीं।
4. भूमिगत आंदोलन और महिला शक्ति का उदय
जब सभी वरिष्ठ नेता जेल में थे, तब अरुणा आसफ अली, जयप्रकाश नारायण, और राम मनोहर लोहिया जैसे युवा नेताओं ने ‘भूमिगत’ (Underground) होकर आंदोलन को ज़िंदा रखा।
महिला शक्ति: अरुणा आसफ अली ने मुम्बई के गोवालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराकर साहस का परिचय दिया। उषा मेहता ने गुप्त रेडियो स्टेशन चलाया। हज़ारों महिलाएँ सड़कों पर उतरीं और उन्होंने पुलिस की लाठियों का सामना किया। यह पहली बार था जब इतनी बड़ी संख्या में महिलाएँ सीधे तौर पर हिंसक या अहिंसक क्रांति में शामिल हुईं।
5. दमन और ऐतिहासिक महत्व
अंग्रेजों ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए बर्बर दमन चक्र चलाया। हज़ारों लोगों को गोली मार दी गई, एक लाख से ज्यादा लोगों को जेल में डाल दिया गया। गाँव के गाँव जला दिए गए। यद्यपि आंदोलन को कुछ समय बाद शांत कर दिया गया, लेकिन इसके परिणाम ऐतिहासिक थे:
अंतिम अल्टीमेटम: इसने अंग्रेजों को यह स्पष्ट कर दिया कि अब वे भारत पर ज्यादा दिनों तक राज नहीं कर सकते।
सशक्त राष्ट्रीय एकता: इस आंदोलन ने हर धर्म, जाति और क्षेत्र के लोगों को एकजुट कर दिया।
आज़ादी की नींव: यह आंदोलन ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में अंतिम कील साबित हुआ और इसी ने 1947 की आज़ादी का रास्ता साफ किया।

