एक गाँव में एक छोटा-सा लड़का रहता था — नाम था आदित्य।
आदित्य बहुत गरीब था, पर उसके मन में एक सपना था—
“एक दिन मैं अपने घर की सारी अंधेरी किस्मत बदल दूँगा।”
लेकिन उसका मज़ाक उड़ाया जाता था।
लोग कहते—
“तू? तू क्या बदलेगा? तेरे पास तो एक ढंग का जूता भी नहीं!”
एक दिन स्कूल में “दीपोत्सव” होना था। सभी बच्चों को एक-एक सुंदर दीपक लाना था।
सबके पास रंग-बिरंगे, बड़े, महँगे दीपक थे।
आदित्य के पास कुछ भी नहीं। घर में रुपये भी नहीं।
शाम को वो अकेला बैठा रो रहा था। तभी उसकी माँ बोली:
“बेटा, अगर बड़ा चिराग नहीं है… तो छोटा सा दिया ही जला ले।
अंधेरा तो वही दूर करेगा।
सपने बड़े हों, साधन छोटे—
फिर भी कोशिश मत छोड़ना।”
आदित्य ने मिट्टी खोदी, पानी मिलाया, अपने हाथों से एक छोटा सा दीपक बनाया।
सुखाया… जलाया… और स्कूल लेकर गया।
सब बड़े दीपक जल रहे थे, लेकिन अचानक हवा तेज़ चलने लगी।
महंगे चिराग एक-एक करके बुझने लगे।
पर आदित्य का छोटा मिट्टी का दीपक—
क्योंकि वो जमीन से चिपका था—
सबसे आखिर में भी जलता रहा।
टीचर ने देखा और कहा:
“देखो बच्चों…
बड़ा होने से कोई महान नहीं होता।
जो मुश्किल वक्त में भी जलता रहे,
वही दुनिया को रोशनी देता है।”
उस दिन पहली बार गाँव वालों ने आदित्य की तरह देखा—
अब मज़ाक नहीं था…
सम्मान था।
और आदित्य ने भी समझ लिया:
“ताक़त साधनों में नहीं, इंसान के हौसले में होती है।”
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कहानी का संदेश
छोटे सपनों से नहीं, छोटी सोच से इंसान हारता है।
जो बातों में नहीं, बल्कि कठिनाइयों में चमकता है, वही असली विजेता है।
परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, कोशिश कभी मत छोड़ना —
दुनियाँ एक दिन तुम्हारी रोशनी जरूर देखेगी।

