एक छोटे से गाँव में आरव नाम का लड़का रहता था। उसके पिता मिट्टी के बर्तन बनाते थे और माँ घरों में काम करती थीं। घर की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि आरव किसी बड़े स्कूल में पढ़ सके। गाँव के सरकारी स्कूल में पढ़ते हुए भी उसके मन में एक बड़ा सपना था—वह एक दिन शिक्षक बनना चाहता था।
गाँव के कुछ लोग उसे देखकर कहते,
“तुम्हारे घर की हालत देखो और सपने देख रहे हो मास्टर बनने के!”
आरव मुस्कुराकर कहता,
“सपने गरीब या अमीर देखकर नहीं आते।”
उसके पास पढ़ने के लिए अलग कमरा नहीं था। रात में जब घर के बाकी लोग सो जाते, तब वह मिट्टी के छोटे से दीपक की रोशनी में पढ़ता। कई बार तेल खत्म हो जाता, लेकिन वह हार नहीं मानता। वह अगले दिन स्कूल में अपने शिक्षक से अतिरिक्त प्रश्न पूछता और जो समझ नहीं आता, उसे बार-बार पढ़ता।
एक दिन परीक्षा के कुछ दिन पहले उसके पिता बीमार पड़ गए। घर की जिम्मेदारी अचानक आरव पर आ गई। सुबह वह पिता के साथ मिट्टी के बर्तन बनाने में मदद करता और दोपहर में स्कूल जाता। रात में थककर लौटने के बाद भी वह पढ़ाई करता।
परीक्षा का परिणाम आया तो पूरे गाँव में चर्चा होने लगी। आरव पूरे जिले में प्रथम आया था।
जिस व्यक्ति ने कभी कहा था कि “गरीब का बच्चा बड़ा सपना नहीं देख सकता”, वही उसके पिता से कहने लगा,
“आपका बेटा तो गाँव का नाम रोशन कर रहा है।”
आरव ने आगे की पढ़ाई पूरी की और कुछ वर्षों बाद उसी गाँव के स्कूल में शिक्षक बनकर लौटा।
पहले दिन उसने बच्चों से कहा—
“परिस्थितियाँ हमारे रास्ते में दीवार बन सकती हैं, लेकिन अगर इरादा मजबूत हो तो वही दीवार हमारी सीढ़ी भी बन सकती है।”
सीख: साधन कम होना असफलता नहीं है। असफलता तब होती है जब हम प्रयास करना छोड़ देते हैं।

