विजयनगर साम्राज्य में तेनालीराम अपनी बुद्धिमत्ता, हास्य और न्यायप्रिय स्वभाव के लिए प्रसिद्ध थे। एक दिन दरबार में एक गरीब किसान पहुँचा। वह बहुत दुखी था। उसने बताया कि उसने एक साहूकार से बीज खरीदने के लिए कुछ पैसे उधार लिए थे। साहूकार ने वादा किया था कि फसल कटने के बाद किसान धीरे-धीरे कर्ज चुका देगा, लेकिन अब वह किसान से दोगुना पैसा माँग रहा था।
राजा कृष्णदेव राय ने साहूकार को बुलवाया। साहूकार बड़े आत्मविश्वास से बोला, “महाराज, मैंने इसे पैसे दिए थे। अब यह लौटाने से बच रहा है।” किसान बोला, “महाराज, मैंने मूल धन लौटाने से कभी मना नहीं किया, पर यह अन्याय कर रहा है।”
राजा ने तेनालीराम की ओर देखा और बोले, “तेनाली, इस मामले में तुम्हारी राय क्या है?”
तेनालीराम कुछ क्षण सोचकर मुस्कुराए और बोले, “महाराज, न्याय का फैसला तराजू से होना चाहिए।” उन्होंने दरबार में एक तराजू मंगवाया।
तेनालीराम ने साहूकार से कहा, “तुम्हारे दिए गए पैसों का वजन तराजू के एक पलड़े में रखो।” साहूकार हैरान हुआ, फिर भी उसने सिक्के रख दिए। अब तेनालीराम ने किसान से कहा, “तुम दूसरे पलड़े में अपनी मेहनत का प्रतीक रखो।” किसान समझ नहीं पाया, पर तेनालीराम के कहने पर उसने अपनी फसल का एक छोटा सा गट्ठर रख दिया।
तेनालीराम बोले, “महाराज, यदि साहूकार को केवल पैसे चाहिए थे, तो किसान की मेहनत का कोई मूल्य नहीं। लेकिन अगर वह दोगुना पैसा चाहता है, तो उसे दोगुनी मेहनत भी करनी चाहिए।” यह सुनकर राजा हँस पड़े। साहूकार शर्मिंदा हो गया और उसने अपनी गलती मान ली।
राजा ने निर्णय दिया कि किसान केवल मूल धन ही लौटाएगा, कोई अतिरिक्त धन नहीं। किसान ने तेनालीराम को धन्यवाद दिया और प्रसन्न मन से लौट गया।
सीख -:
सच्चा न्याय वही है जो लालच नहीं, बल्कि मेहनत और ईमानदारी को महत्व दे। बुद्धि और विवेक से हर समस्या का समाधान संभव है।

