एक बार की बात है, विजयनगर के राजा कृष्णदेवराय अपने दरबार में बैठे थे। उन्होंने दरबारियों से पूछा —
“अगर किसी को सोने का पहाड़ मिल जाए तो वह क्या करेगा?”
सब दरबारी अपनी-अपनी बात कहने लगे —
किसी ने कहा कि वह मंदिर बनाएगा,
किसी ने कहा कि गरीबों की मदद करेगा,
तो कोई बोला कि वह व्यापार बढ़ाएगा।
राजा ने मुस्कुराते हुए तेनालीराम से पूछा —
“तेनालीराम, तुम क्या करोगे अगर तुम्हें सोने का पहाड़ मिल जाए?”
तेनालीराम बोला —
“महाराज! मैं दूसरा पहाड़ ढूँढने निकल जाऊँगा।”
सब दरबारी हँसने लगे और बोले — “तेनालीराम, तुम तो बहुत लालची निकले!”
तेनालीराम मुस्कुराकर बोला —
“नहीं महाराज, मेरा मतलब है कि मनुष्य का लालच कभी खत्म नहीं होता।
चाहे उसे कितना भी मिले, वह और पाने की इच्छा रखता है।
इसलिए मैंने कहा कि मैं दूसरा पहाड़ ढूँढूँगा।”
राजा को तेनालीराम की बात बहुत पसंद आई।
उन्होंने कहा — “तेनालीराम, तुम्हारी बात में सच्चाई है।
लालच का कोई अंत नहीं होता।”
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襁 सीख:
लालच इंसान को कभी संतुष्ट नहीं रहने देता।
जो मिला है, उसी में संतोष करना ही सच्ची समझदारी है।

