मोहन के पास शहर में एक छोटी सी चाय की दुकान थी। दुकान इतनी छोटी थी कि उसमें केवल चार लोग ही बैठ सकते थे।
पास में एक बड़ा कैफे खुल गया। वहाँ सुंदर कुर्सियाँ, चमकदार रोशनी और महंगे सामान थे। कुछ ही दिनों में मोहन की दुकान पर ग्राहक कम होने लगे।
लोगों ने कहा,
“अब तुम्हारी दुकान नहीं चलेगी। इसे बंद कर दो।”
मोहन ने दुकान बंद नहीं की।
उसने सोचा, “अगर मैं बड़े कैफे से मुकाबला नहीं कर सकता, तो मुझे अपनी अलग पहचान बनानी होगी।”
उसने दुकान को साफ-सुथरा किया। ग्राहकों से मुस्कुराकर बात करने लगा। विद्यार्थियों के लिए कम कीमत पर चाय और नाश्ता देने लगा। उसने दुकान के बाहर एक छोटा सा बोर्ड लगाया—
“यहाँ चाय के साथ मुस्कान मुफ्त है।”
धीरे-धीरे विद्यार्थी उसकी दुकान पर आने लगे।
मोहन हर ग्राहक का नाम याद रखता। किसी विद्यार्थी का परीक्षा परिणाम अच्छा आता तो वह उसे बधाई देता। कोई परेशान होता तो वह दो मिनट बैठकर उसकी बात सुनता।
कुछ महीनों बाद उसकी दुकान फिर चलने लगी।
एक दिन वही बड़ा कैफे चलाने वाला व्यक्ति मोहन के पास आया और बोला,
“तुम्हारी दुकान इतनी छोटी है, फिर भी यहाँ हमेशा लोग क्यों रहते हैं?”
मोहन ने हँसकर कहा,
“क्योंकि मैं चाय नहीं, अपनापन बेचता हूँ।”
सीख: सफलता हमेशा बड़े साधनों से नहीं मिलती। मेहनत, व्यवहार और अपनी अलग पहचान भी सफलता की मजबूत नींव बन सकते हैं।

