इन दिनों दुनिया भर में एक नाम बार-बार गूंज रहा है—एप्सटीन फाइल। वजह साफ है: इसमें सिर्फ एक अपराधी की कहानी नहीं, बल्कि ताक़त, पैसा और चुप्पी के खतरनाक गठजोड़ की झलक दिखती है।
जेफ़्री एप्सटीन—
एक ऐसा अमीर अमेरिकी शख़्स, जिस पर नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण और सेक्स-ट्रैफिकिंग जैसे जघन्य आरोप लगे। लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं होता। असली हलचल तब मची, जब कोर्ट से जुड़े दस्तावेज़ों में दुनिया के बड़े-बड़े नामों का ज़िक्र सामने आया।
राजनेता, उद्योगपति, हॉलीवुड सितारे—नाम ऐसे जिनसे समाज प्रेरणा लेने की उम्मीद करता है।
यहीं से सवाल उठता है:

क्या ये सभी दोषी हैं? या फिर सच्चाई इससे ज़्यादा जटिल है?
✨ हकीकत यह है कि किसी का नाम आ जाना अपराध साबित नहीं करता।
कई नाम सिर्फ गवाहियों, ईमेल्स या जान-पहचान के संदर्भ में सामने आए हैं। अदालत ने यह साफ किया है कि दस्तावेज़ों में ज़िक्र होना और अपराधी होना—दो अलग बातें हैं।
फिर भी यह मामला हमें एक कड़वी सच्चाई से रू-बरू कराता है—
जब अपराध ताक़तवर लोगों के इर्द-गिर्द होता है, तो इंसाफ़ की राह आसान नहीं रहती।
एप्सटीन फाइल किसी एक व्यक्ति का मामला नहीं है।
यह उस सिस्टम पर सवाल है जो कभी-कभी सच को सालों तक दबाए रखता है।
यह याद दिलाती है कि
नाम चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो
पद चाहे कितना ही ऊँचा क्यों न हो
कानून और नैतिकता से ऊपर कोई नहीं होना चाहिए।
आज ज़रूरत है सनसनी फैलाने की नहीं,
बल्कि तथ्यों को समझने, झूठी अफवाहों से बचने और पीड़ितों की आवाज़ को प्राथमिकता देने की।
क्योंकि असली इंसाफ़
नाम उछालने में नहीं,
सच्चाई तक पहुँचने में है।

