भारत के इतिहास में कुछ गीत ऐसे हैं जो समय की सीमाओं को लांघकर अमर हो जाते हैं। ऐसा ही एक गीत है— “सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा”। इसे ‘तराना-ए-हिंदी’ भी कहा जाता है। 1904 में रचित यह गीत आज भी हर भारतीय की धड़कन है। आइए, Indiamitra के इस विशेष लेख में जानते हैं कि कवि मोहम्मद इक़बाल ने इस कालजयी रचना को कैसे और क्यों लिखा।
1. गीत का जन्म: एक कॉलेज की प्रार्थना से शुरुआत
इस गीत की रचना प्रसिद्ध दार्शनिक और कवि मोहम्मद इक़बाल (जिन्हें ‘अल्लामा इक़बाल’ भी कहा जाता है) ने की थी। 1904 में जब वे लाहौर के सरकारी कॉलेज में पढ़ाते थे, तब एक छात्र सम्मेलन के लिए उनसे कुछ लिखने का आग्रह किया गया। इक़बाल ने राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत यह कविता लिखी और पहली बार इसे लाहौर के ही एक समारोह में पढ़ा। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि एक छात्र सभा के लिए लिखा गया यह गीत पूरे देश का तराना बन जाएगा।
2. ‘यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा’: भारतीय गौरव का वर्णन
इक़बाल ने इस गीत में भारत की तुलना दुनिया की सबसे पुरानी और महान सभ्यताओं से की है। वे लिखते हैं:
“यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा, सब मिट गए जहाँ से,
अब तक मगर है बाक़ी, नाम-ओ-निशाँ हमारा।”
इन पंक्तियों के माध्यम से इक़बाल ने यह संदेश दिया कि दुनिया की बड़ी-बड़ी सभ्यताएं (जैसे प्राचीन ग्रीस, मिस्र और रोम) समय के साथ नष्ट हो गईं, लेकिन भारतीय संस्कृति और उसकी जड़ें आज भी वैसी ही मजबूत और जीवित हैं। यह गीत भारतीयों के भीतर अपनी विरासत के प्रति गौरव जगाने का एक सशक्त माध्यम बना।
3. ‘मज़हब नहीं सिखाता’: एकता का सबसे बड़ा मंत्र
इस गीत की सबसे प्रभावशाली पंक्ति है— “मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना”। यह पंक्ति आज भी भारत की धर्मनिरपेक्षता और ‘अनेकता में एकता’ की पहचान है। महात्मा गांधी इस पंक्ति के बहुत बड़े प्रशंसक थे। जब वे यरवदा जेल में थे, तब वे इस गीत को अक्सर गुनगुनाते थे। उनका मानना था कि यह गीत हृदय को पवित्र करता है और हमें एक-दूसरे का सम्मान करना सिखाता है।
4. पंडित रविशंकर का संगीत और अंतरिक्ष का सफर
मूल रूप से यह कविता एक ग़ज़ल की तरह धीमी लय में गाई जाती थी। लेकिन 1945 में महान सितार वादक पंडित रविशंकर ने इसे वह जोशीली धुन दी, जिसे आज हम सुनते हैं। इस धुन ने गीत में एक नई जान फूँक दी।
इतना ही नहीं, 1984 में जब भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा से इंदिरा गांधी ने पूछा कि अंतरिक्ष से भारत कैसा दिखता है, तो उनका जवाब था— “सारे जहाँ से अच्छा”। इस एक वाक्य ने इस गीत की प्रासंगिकता को ब्रह्मांड तक पहुँचा दिया।
5. आज का महत्व: सेना और गणतंत्र की शान
आज ‘सारे जहाँ से अच्छा’ भारतीय सशस्त्र बलों का आधिकारिक मार्चिंग गीत है। हर साल ‘बीटिंग रिट्रीट’ समारोह के दौरान जब सेना के बैंड इस धुन को बजाते हैं, तो हर भारतीय का सिर गर्व से ऊँचा हो जाता है।

