1906 से आज तक
भारतीय ध्वज केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की अस्मिता, त्याग और अखंडता का प्रतीक है। आज हम जिस ‘तिरंगे’ को शान से लहराते हुए देखते हैं, वह रातों-रात अस्तित्व में नहीं आया। 1906 से लेकर 1947 तक इसके स्वरूप में कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए, जो भारत के बदलते राजनैतिक और क्रांतिकारी परिवेश को दर्शाते हैं।
1. प्रथम ध्वज: 1906 (पारसी बागान चौक, कोलकाता)
भारत के पहले गैर-आधिकारिक ध्वज का अनावरण 7 अगस्त 1906 को कोलकाता में हुआ था। इस ध्वज में तीन क्षैतिज पट्टियाँ थीं— हरा, पीला और लाल।
सबसे ऊपर की हरी पट्टी में आठ आधे खिले हुए कमल के फूल थे।
बीच की पीली पट्टी पर नीले रंग में ‘वन्दे मातरम्’ लिखा था।
सबसे नीचे की लाल पट्टी पर सूर्य और अर्धचंद्र के चित्र अंकित थे।
2. मैडम कामा का ध्वज:
1907 (पेरिस और जर्मनी)
दूसरा ध्वज क्रांतिकारी मैडम भीखाजी कामा द्वारा 1907 में जर्मनी के स्टटगार्ट में फहराया गया। यह पहले ध्वज जैसा ही था, लेकिन इसमें ऊपरी पट्टी पर केवल सात सितारे (सप्तऋषि) थे। यह विदेशी धरती पर फहराया जाने वाला पहला भारतीय ध्वज था।
3. होम रूल आंदोलन ध्वज: 1917
एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने होम रूल आंदोलन के दौरान एक नया ध्वज अपनाया। इसमें 5 लाल और 4 हरी क्षैतिज पट्टियाँ थीं और एक कोने में ‘यूनियन जैक’ भी था। हालांकि, यह ध्वज जनता के बीच बहुत लोकप्रिय नहीं हुआ क्योंकि इसमें ब्रिटिश प्रभाव दिखाई देता था।
4. पिंगली वेंकैया का ध्वज और गांधीजी का चरखा:
1921 में विजयवाड़ा में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सत्र के दौरान, पिंगली वेंकैया ने एक ध्वज गांधीजी को प्रस्तुत किया। इसमें शुरू में लाल और हरा रंग था (हिंदू और मुस्लिम समुदायों के प्रतीक)। गांधीजी के सुझाव पर इसमें शांति और अन्य समुदायों के लिए सफेद पट्टी और प्रगति के प्रतीक के रूप में ‘चरखा’ जोड़ा गया।
5. स्वराज ध्वज: 1931 (ऐतिहासिक मोड़)
साल 1931 तिरंगे के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ। कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर तिरंगे को अपना ध्वज स्वीकार किया। इसमें रंगों का क्रम बदलकर केसरिया, सफेद और हरा कर दिया गया और बीच में गांधीजी का चरखा रखा गया। यह ध्वज सांप्रदायिकता से ऊपर उठकर राष्ट्रवाद का प्रतीक बना।
6. वर्तमान तिरंगा: 1947
जब भारत आजाद होने वाला था, तब डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता वाली समिति ने राष्ट्रीय ध्वज का चयन किया। 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसे अपनाया। इसमें चरखे की जगह सम्राट अशोक के ‘धर्म चक्र’ (नीले रंग का पहिया जिसमें 24 तीलियाँ हैं) को स्थान दिया गया।
निष्कर्ष
केसरिया रंग साहस और बलिदान का, सफेद शांति और सच्चाई का, और हरा रंग उर्वरता और प्रगति का प्रतीक है। चक्र हमें निरंतर गतिमान रहने की प्रेरणा देता है। 1906 के कमल के फूलों से लेकर 1947 के अशोक चक्र तक का यह सफर भारत की स्वतंत्रता और संप्रभुता की वह कहानी है, जिसे हर भारतीय को गर्व के साथ याद रखना चाहिए।
निष्कर्ष
केसरिया रंग साहस और बलिदान का, सफेद शांति और सच्चाई का, और हरा रंग उर्वरता और प्रगति का प्रतीक है। चक्र हमें निरंतर गतिमान रहने की प्रेरणा देता है। 1906 के कमल के फूलों से लेकर 1947 के अशोक चक्र तक का यह सफर भारत की स्वतंत्रता और संप्रभुता की वह कहानी है, जिसे हर भारतीय को गर्व के साथ याद रखना चाहिए।

