21 अक्टूबर 1943—यह वह ऐतिहासिक दिन था जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर के कैथे सिनेमा हॉल में दुनिया को चौंकाते हुए ‘आजाद हिंद सरकार’ (Arzi Hukumat-e-Azad Hind) की स्थापना की घोषणा की थी। यह केवल एक संगठन नहीं था, बल्कि एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में भारत का उदय था। Indiamitra के इस लेख में हम जानेंगे कि कैसे नेताजी ने विदेशी धरती से एक पूरी सरकार, बैंक, और सेना का संचालन किया।
1. सरकार की स्थापना और मान्यता
नेताजी का मानना था कि अंग्रेजों को भारत से निकालने के लिए केवल आंदोलनों की नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित सरकार और आधुनिक सेना की जरूरत है।
वैश्विक मान्यता: नेताजी की इस अस्थायी सरकार को जापान, जर्मनी, इटली, क्रोएशिया, बर्मा और फिलीपींस सहित 9 देशों ने आधिकारिक मान्यता दी थी।
अपना क्षेत्र: इस सरकार का अपना क्षेत्र भी था। जापान ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को आजाद हिंद सरकार को सौंप दिया था, जिनका नाम नेताजी ने क्रमशः ‘शहीद’ और ‘स्वराज’ द्वीप रखा था।
2. सरकार का ढांचा: खुद का बैंक और मुद्रा
आजाद हिंद सरकार किसी भी पूर्ण विकसित राष्ट्र की तरह काम कर रही थी:
मंत्रिमंडल: नेताजी स्वयं राज्य के प्रमुख, प्रधान मंत्री और युद्ध मंत्री थे। कैप्टन लक्ष्मी सहगल (महिला विंग), एस.ए. अय्यर (प्रचार विभाग) और रास बिहारी बोस (मुख्य सलाहकार) जैसे दिग्गज उनके मंत्रिमंडल में शामिल थे।
आजाद हिंद बैंक: 1944 में रंगून (बर्मा) में ‘आजाद हिंद बैंक’ की स्थापना की गई। इस बैंक की अपनी मुद्रा (Currency) थी और अपनी डाक टिकटें थीं। नेताजी ने दिखाया कि भारत अपना वित्तीय प्रबंधन खुद कर सकता है।
राष्ट्रगान और नारा: ‘कदम कदम बढ़ाए जा’ इस सरकार का मार्चिंग गान था और ‘जय हिंद’ का अमर नारा यहीं से पूरी दुनिया में गूँजा।
3. ‘झांसी की रानी रेजीमेंट’: महिला शक्ति का उदय
नेताजी आधुनिक सोच के नेता थे। उन्होंने आजाद हिंद फौज (INA) के भीतर दुनिया की पहली महिला कॉम्बैट रेजिमेंट में से एक— ‘झांसी की रानी रेजिमेंट’ बनाई। इसका नेतृत्व कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने किया। यह इस बात का प्रमाण था कि नेताजी की सरकार में महिलाओं को पुरुषों के बराबर युद्ध के मैदान में अधिकार प्राप्त थे।
4. “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा”
इसी सरकार के गठन के दौरान नेताजी ने अपना सबसे प्रसिद्ध आह्वान किया था। उन्होंने दुनिया भर में फैले भारतीयों से अपनी संपत्ति और जीवन देश के लिए दान करने की अपील की। दक्षिण-पूर्व एशिया के भारतीयों ने अपनी गाढ़ी कमाई इस सरकार के खजाने में डाल दी ताकि ‘दिल्ली चलो’ का सपना पूरा हो सके।
5. ऐतिहासिक महत्व: आजादी की नींव
यद्यपि द्वितीय विश्व युद्ध के अंत और नेताजी के रहस्यमयी तरीके से गायब होने के बाद यह सरकार प्रत्यक्ष रूप से सत्ता में नहीं रही, लेकिन इसके प्रभाव ने ब्रिटिश भारत की नींव हिला दी।
लाल किले में हुए आजाद हिंद फौज के सैनिकों के मुकदमों ने भारतीय सेना (British Indian Army) के भीतर विद्रोह की ज्वाला भड़का दी।
इसी दबाव के कारण अंग्रेजों को अंततः 1947 में भारत छोड़ने का फैसला लेना पड़ा।

