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Home»Indain history facts»वन्दे मातरम्: आनंदमठ के पन्नों से निकलकर आजादी का मंत्र बनने तक की गाथा
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वन्दे मातरम्: आनंदमठ के पन्नों से निकलकर आजादी का मंत्र बनने तक की गाथा

Updated:May 31, 2026
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भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ‘वन्दे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक प्रचंड भावना का नाम था। यह वह मंत्र था जिसने निहत्थे भारतीयों के भीतर ब्रिटिश साम्राज्य से टकराने का साहस भर दिया। ऋषि बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित यह पावन गीत भारत माता की स्तुति है, जिसमें देश की उर्वरता, शक्ति और सुंदरता का वर्णन है। आइए जानते हैं, कैसे एक उपन्यास का हिस्सा बना यह गीत भारतीय राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया।

1. गीत का सृजन: बंकिम बाबू की दिव्य कल्पना

‘वन्दे मातरम्’ की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1870 के दशक (संभवतः 1876) में की थी। उस समय भारत पर अंग्रेजों का शासन था और ‘गॉड सेव द क्वीन’ जैसे गीतों का बोलबाला था। बंकिम बाबू एक ऐसी रचना चाहते थे जो भारतीयों को अपनी मातृभूमि के प्रति गौरव का अहसास कराए। उन्होंने संस्कृत और बंगाली के मिश्रण से इस अद्भुत गीत को तैयार किया।
1882 में जब उनका प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ प्रकाशित हुआ, तब उन्होंने इस गीत को उसमें शामिल किया। उपन्यास में यह गीत ‘संन्यासी विद्रोह’ के समय साधु-क्रांतिकारियों द्वारा गाया जाता था, जो देश को शत्रुओं से मुक्त कराने का संकल्प लेते हैं।

2. बंग-भंग और राष्ट्रवाद की लहर

वन्दे मातरम् को असली प्रसिद्धि 1905 के बंगाल विभाजन (Lord Curzon’s Partition of Bengal) के दौरान मिली। अंग्रेजों ने बंगाल को दो हिस्सों में बांटकर फूट डालो और राज करो की नीति अपनाई थी। इसके विरोध में जब जनसैलाब सड़कों पर उतरा, तो ‘वन्दे मातरम्’ उनका मुख्य नारा बन गया।
कोलकाता की सड़कों पर हज़ारों लोग एक स्वर में ‘वन्दे मातरम्’ का उद्घोष कर रहे थे। रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे संगीतबद्ध किया और कांग्रेस के अधिवेशनों में इसे गाकर राष्ट्रवाद की अलख जगाई। यह गीत इतना प्रभावशाली था कि ब्रिटिश सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया और इसे बोलने वालों को जेल में डालना शुरू कर दिया।

3. क्रांतिकारियों की अंतिम पुकार

इतिहास गवाह है कि कई क्रांतिकारी ‘वन्दे मातरम्’ गाते हुए हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गए। लाला लाजपत राय ने इसी नाम से एक उर्दू पत्रिका निकाली, तो मैडम भीखाजी कामा ने 1907 में जर्मनी में फहराए गए भारत के पहले ध्वज पर ‘वन्दे मातरम्’ अंकित किया।
चाहे वह अरविंदो घोष हों, बिपिन चंद्र पाल हों या फिर भगत सिंह—हर किसी के लिए यह गीत ऊर्जा का स्रोत था। इसने सिद्ध कर दिया कि भारत केवल एक भूमि का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक जीती-जागती ‘माँ’ है, जिसकी रक्षा करना हर संतान का धर्म है।

4. स्वतंत्रता के बाद: राष्ट्रीय गीत का गौरव

आजादी मिलने के बाद, 24 जनवरी 1950 को भारत की संविधान सभा ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया। ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान (National Anthem) और ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत (National Song) के रूप में स्वीकार किया गया। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट किया था कि वन्दे मातरम् को वही सम्मान और स्थान दिया जाएगा जो राष्ट्रगान को प्राप्त है।

निष्कर्ष
आज भी जब हम ‘वन्दे मातरम्’ सुनते हैं, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह गीत हमें याद दिलाता है कि हमारी आजादी कितनी महँगी है। बंकिम चंद्र चटर्जी की यह अमर रचना कल भी प्रासंगिक थी, आज भी है और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी देशभक्ति का सबसे बड़ा मंत्र बनी रहेगी।

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