विजयनगर का बाज़ार हमेशा रौनक से भरा रहता था। दूर–दूर से व्यापारी अपने सामान बेचने आते थे। उन्हीं में से एक था मरुथप्पा, जो अपनी लालच भरी आदतों के लिए जाना जाता था। वह नकली बाटों का उपयोग कर ग्राहकों से ज़्यादा पैसे वसूलता था। कई लोगों ने इसकी शिकायत राजा से की, और राजा ने सच्चाई जानने की ज़िम्मेदारी तेनालीराम को दी।
तेनालीराम एक गरीब यात्री के रूप में भेष बदलकर मरुथप्पा की दुकान पर पहुँचे। उन्होंने थोड़ी-सी चावल खरीदने की इच्छा जताई। व्यापारी ने मुस्कुराते हुए चावल तौले, लेकिन उसके बाट अंदर से खोखले थे, जिससे तौल ज़्यादा दिखती थी।
तेनालीराम ने तुरंत चालाकी समझ ली, पर उन्होंने दिखाया कि उन्हें कुछ पता नहीं चला। उन्होंने विनम्रता से कहा, “व्यापारी जी, मैं नदी पार करने जा रहा हूँ। क्या आप अपना एक बाट मुझे थोड़ी देर के लिए दे सकते हैं? मुझे अपने थैले की मजबूती जाँचनी है।”
मरुथप्पा ने सोचा कि इसमें कोई नुकसान नहीं, और उसने बाट दे दिया। तेनालीराम उसे लेकर सीधे राजा के महल पहुँचे। थोड़ी देर बाद पहरेदार व्यापारी को भी ले आए, जो घबराया हुआ था।
राजा ने जब उस बाट की जाँच करवाई, तो पता चला कि वह अंदर से खोखला है और गलत तौल दिखाता है। अब व्यापारी के पास कोई बहाना नहीं था।
राजा उसे दंड देना चाहते थे, लेकिन तेनालीराम ने कहा, “महाराज, इसे दंड देने से बेहतर है कि यह अपनी गलती सुधारने का अवसर पाए। इसे आदेश दें कि यह हर cheated ग्राहक को वापस पैसा लौटाए और एक वर्ष तक ईमानदारी से व्यापार करे। यदि यह सुधर जाए, तो इसकी गलती क्षमा कर दी जाए।”
राजा ने यह सलाह मान ली। मरुथप्पा ने शर्मिंदा होकर सबका पैसा लौटाया और एक साल तक ईमानदारी से व्यापार किया। धीरे-धीरे उसे लोगों का विश्वास भी वापस मिलने लगा।
नैतिक शिक्षा:
लालच से थोड़ी कमाई तो हो सकती है, पर सच्ची इज़्ज़त और सफलता केवल ईमानदारी से मिलती है।


